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Death anniversary: परदे के पीछे मीना कुमारी..

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प्रसिद्ध फिल्म डायरेक्टर कमाल अमरोही के नाते मीना कुमारी का नाम अमरोहा की आलमी शख्सियतों के साथ भी जुड़ गया है। आज मीना कुमारी की पुण्यतिथि है। मीना कुमारी फिल्म इंडस्ट्री में आजाद ख्याल का चेहरा बनकर रहीं, स्वयं अपने शौहर की बंदिशों में भी नहीं बंध सकीं। मीना कुमारी के अन्तिम दिनों का जिक्र करती हुई,कमाल अमरोही साहब की बेटी रुखसार अमरोही, पाकिस्तानी अखबार डॉन को दिए एक इंटरव्यू में कहतीं हैं,मीना कुमारी अपने अंतिम दिनों में, केवल कमाल अमरोही को अपने अपार्टमेंट में बुलाती थीं। वो अभी भी बाबा(कमाल) की बहुत परवाह करती थीं। रुखसार कहती हैं, ''मैं भी उनके साथ उस जब अपार्टमेंट में जाती थी, तो छोटी अम्मी (मीना) दर्द की गर्त में डूब जाती थी।"  एक बार एक पार्टी में मेरे बाबा को पान की पेशकश की गई थी। इसे खाते ही उन्हें लगा कि उनका सिर घूमने लगा है, जैसे-तैसे बाबा बेहोशी की हालत में घर पहुंचे। हम सभी बहुत चिंतित थे और छोटी अम्मी को फोन किया तो तुरंत हमारे अपार्टमेंट में आ गईं। वह सीढ़ियाँ नहीं चढ़ सकती थी इसलिए हम उनसे मिलने नीचे गए। वह वास्तव में चिंतित थीं। उन्होंने हमसे कहा कि,

रानी दुर्गावती आत्मसम्मान से भरी नायिका

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महोबा के चंदेल राजपूत शासक की पुत्री दुर्गावती सोलहवीं शताब्दी में गोंडवाना की प्रगति शासक बनीं। दुर्गावती बहादुर महिला थी उन्होंने मध्यप्रदेश स्थित मालवा के शासक बाज बहादुर के आक्रमण से अपने राज्य की रक्षा करने के साथ-साथ तेजी सेे बढ़ते मुगल साम्राज्यवाद को भी रोका। मालवा के अफ़गान लोगों से उनकी कई बार मुठभेड़ हुईं जिसमें वह सदैव विजेता रहींं। बन्दूक चलाने और तीरंदाजी में वो माहिर थीं हीं। इतिहास गवाह है सन् 1564 में जब अकबर ने आसिफ खान को आदेश दिया कि गोंडवाना को दबाया जाए तो दुर्गावती ने मुगल आधिपत्य स्वीकार करने से इंकार कर दिया। दुर्गावती ने मुगल आक्रमण का मुकाबला किया। इस युद्ध में उनका बेटा भी घायल हुआ। इस युद्ध में मुगल सेना उन पर भारी होती जा रही थी इस दौरान दुर्गावती परास्त होने लगीं तो उन्होंने रण छोड़ने से इंकार किया और शत्रु के हाथो बंदी बनने के बजाय दुर्गावती ने आत्महत्या कर ली। अबुल फजल ने लिखा है कि "साहस और प्रयासो का दुर्गावती में अभाव नहीं था उनका स्मारक आज भी वहीं बना है जिस खाईं में वो गिरी थीं।"                           मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के सम

महामना पण्डित मदन मोहन मालवीय का स्त्री विमर्श

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महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जिनका जन्म जिला प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) में 25 दिसंबर 1861 को और देहांत 12 नवंबर 1946 को काशी में हुआ था जो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए प्रेरणा और एक आदर्शवादी पुरुष थेे। मालवीय जी का स्त्री विमर्श के लिए योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। मालवीय जी ने स्त्रियों की सामाजिक दशा को सुधारने और उन्हें विकास व प्रगति का अवसर प्रदान करने के लिए अनेक उल्लेखनीय कार्य किया। समाज में प्रचलित दहेज प्रथा, बाल विवाह, पर्दा प्रथा से स्त्रियों को मुक्ति और विधवा-विवाह के समर्थन में आवाज उठाई। स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक रहे मालवीय जी का मानना था,पुरुषों की शिक्षा से स्त्रियों की शिक्षा का अधिक महत्व है क्योंकि वही भारत की भावी संतानो की माता है, वही हमारे भावी राजनीतिज्ञों, विद्वानों, नेताओं तथा अन्य लोगों की प्रथम शिक्षिका है।मालवीय जी चाहते थे कि स्त्री इतनी सशक्त हो कि उसे आत्मरक्षा के लिय पुरषों का आसरा ना देखना पड़े। मालवीय जी कठोर पर्दा-प्रथा में विश्वास नहीं रखते थे। जो प्रथा महिलाओ की प्रगति में भी बाधक हो,मालवीय जी ने उसकी कड़ी निन्दा की। वैदिक युग में पर्दा प्रथ

25 मार्च बलिदान दिवस: साम्प्रदायिकता से दो-दो हाथ करने वाले पत्रकार गणेश शंकर 'विद्यार्थी'

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📷 : गूगल  बात 1915 की है जब गणेश शंकर विद्यार्थी जी महज 25 साल के थे। उन्होंने 'राष्ट्रवाद' सम्बंधित शीर्षक से कुछ लेख लिखे, जिसमें उन्होंने न केवल युवाओं का ध्यान ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ने के लिए आकर्षित किया, बल्कि राष्ट्रवाद और धर्मांधता के बीच अंतर को भी बखूबी तरीके से समझाया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद सांप्रदायिक पहचान पर आधारित नहीं होना चाहिए, इसकी उत्पत्ति राज्य की प्रकृति पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा प्राकृतिक सीमाओं और विविधता ने राष्ट्र को दुनिया से अलग रखा है और राष्ट्रीय भावना का विकास मानव जाति के विकास की दिशा में एक कदम है। यह स्वतःस्फूर्त था, कुछ आदर्शों पर आधारित था और सच्ची देशभक्ति को पोषित करता था। उन्होंने महसूस किया कि धर्म हमेशा मानव प्रगति के लिए एक बाधा है। राष्ट्रीय भावना एक लहर थी जिसने उन्नीसवीं सदी में दुनिया को झकझोर कर रख दिया था। जो लोग हिंदू राष्ट्र में विश्वास करते थे, उनके अनुसार वे लोगों को मूर्ख बना रहे थे क्योंकि वे राष्ट्र का अर्थ नहीं समझ सकते थे हालांकि वे भविष्यवक्ता नहीं थे, उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि इतने लंबे समय तक

बापू मुझे माफ़ करना मैं भगत सिंह को माफीनामे के लिए मना नहीं सका

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शहीद भगत सिंह की फांसी से होने वाले विद्रोह को लेकर ब्रिटिश सरकार कांप कर रही थी दरअसल भगत सिंह की शहादत के बाद देशभर में होने वाले विद्रोह की ताकत को ब्रिटिश सरकार भली-भांति जानती थी इसलिए ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि किसी भी तरह भगत सिंह ब्रिटिश सरकार से माफ़ी मांग लें इससे विद्रोह भी नहीं होगा और हमारी शान में कसीदे भी पढ़े जाएंगे.. इसके लिए खुरापाती योजना बनाई गई।  तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन ने गांधीजी के समक्ष भगत सिंह की फांसी को स्थगित करने या स्थाई तौर पर रोकने का प्रस्ताव रखा। भगत सिंह की फांसी को रोकना ... वायसराय के मुंह से प्रस्ताव सुनकर गांधी जी कुछ देर अचरज में पड़ गए। गांधीजी ने पूछा कि, क्या यह बिना किसी शर्त के मंजूर है? तब वायसराय ने कहा, आपको केवल इतना करना है, भगत सिंह का बयान लिखित में लेना है। गांधी जी बोले कैसा बयान? "बस यही कि मैंने जो ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध अब तक षड्यंत्र किया, मैं उसके लिए माफी चाहता हूं बस..!!" गांधीजी ने कहा मैं कैसे कह सकता हूं कि भगत सिंह की इस बारे में राय क्या है ? वायसराय बोले ठीक है मैं आपको 1 वर्ष का समय देता हूं। गांधी जी

KashmiriPandits: कश्मीरी पंडितों की त्रासदी का जिम्मेदार कौन कांग्रेस या भाजपा ?

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इतिहास में कोई भी घटना यकायक नहीं होती, त्रासदी अपने पीछे एक कालखंड रखती है। फिल्म डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री की मूवी 'द कश्मीर फाइल्स' आने के बाद से छलकुट वर्ग में उपद्रव का माहौल है। होली पर जल बचाने की नसीहत देकर साम्प्रदायिकता फैला रहे वाकपटुते इस फिल्म से साम्प्रदायिक सद्भाव का रोना रो रहे हैं। वहीं कांग्रेस ने भी अपने साम्प्रदायिक अंदाज में इस नरसंहार में मरने वाले लोगों का ठीकरा भाजपा सरकार पर फोड़ा है। कुछ लोग कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए भाजपा सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। अब जब इस पर बहस चल रही है तो यह जान लेना भी आवश्यक है कि इस त्रासदी को खड़ा करने के पीछे आखिर किसका हाथ था?  बात इन्दिरा गांधी के कार्यकाल की है जब 1971 के युद्ध में पाकिस्तान न केवल भारत से हार गया, बल्कि दो हिस्से में बंट गया। यह वो दौर था जब अब्दुल्ला और कश्मीर भारत के करीब आ गए थे। सन् 1972 में, अब्दुल्ला ने "भारत सरकार के साथ हमारा विवाद" की घोषणा की,यह विवाद भारत के साथ विलय के बारे में नहीं बल्कि स्वायत्तता के बारे में था। उसके बाद सन्1975 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और

हस्तक्षेप: विनोद कुमार शुक्ल रायल्टी विवाद और लॉबी बाजी

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📷 : विनोद कुमार शुक्ल (गूगल) वरिष्ठ साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल जी की रॉयल्टी का विवाद साहित्य जगत में विमर्श का केंद्र बना हुआ है।  फिल्म जगत में लता जी और रफी साहब का विवाद ऐतिहासिक रहा लेकिन साहित्यिक जगत में कभी इस मुद्दे पर विस्तार के साथ विमर्श नहीं हुआ।ऐसा नहीं है कि आज से पहले कोई लेखक पीड़ित नहीं था या फिर मुद्दा नया है लेकिन कुछेक उदाहरणों को छोड़ दें तो इतनी तादाद में लोग मुखरता के साथ कभी आगे नहीं आए।  हालांकि युगों-युगों से हिन्दी पट्टी में चलती आ रही वज्रपात की परम्परा का भी कुछ स्थापित लेखकों ने पूरा ध्यान रखा है। रॉयल्टी मामले में हस्तक्षेप करते हुए एक लेखक का कहना‌ है "शुक्ल जी की कितनी कविता, किताबें आपने पढ़ी हैं? जो रॉयल्टी पर भाषण दिए जा रहे हो" अरे भई, कोई इनको बताओ तो.. मुद्दा ये‌ नहीं है रॉयल्टी जनरेट करने के लिए उनकी कितनी किताबें, कविताएं पढ़ी हैं या जिन्होंने पढ़ी हैं वहीं इस मुद्दे पर बोल सकते हैं। मामला सीधे तौर पर शुक्ल जी से जुड़ा जरूर है लेकिन मुद्दा रॉयल्टी के जरिए सम्बन्धों में पारदर्शिता का भी है। मैं पूछना चाहता हूं, तीन कृषि कानून सम्बंध