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अमरोहा की एक सुबह - 1947

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आजाद सुबह की सूर्य रश्मियों के पीछे बंटवारे की आह अमरोहा के आल्हादित वातावरण में छिपी न रह सकी। विभाजन के बाद पंजाब से विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए एक स्पेशल ट्रेन शरणार्थियों को लेकर अमरोहा भी पहुंची। इसकी सूचना पहले ही मिल चुकी थी और शहर के समाजसेवी मेहमानों को अपने दिलों में जगह देने की तैयारी शुरू कर चुके थे। बहुत-दिन पहले से ही लोग चादर तान कर घर-घर जा गेहूं का आटा इकट्ठा कर रहे थे। लोग भी स्वेच्छा से सहयोग कर रहे थे। मैं लगभग 8 वर्ष का रहा होउंगा, किन्तु सभी कुछ तो याद है।  वह सब कितना अलग था एक दम से इतनी सारी नई शक्लें,अलग पहनावा और भाषा भी, जो अमरोहा में इसके पहले कभी नहीं सुनी गई थी। हमारे घर मोतीभवन के हाते में भी कुछ शरणार्थियों को टिकाने की व्यवस्था की गई थी। विभिन्न आवश्यकताओं के लिये बहुत से खपरैल के छप्पर बने हुए थे। उन्हें रिहायशी उपयोग के लिए परिवर्तित किया गया। जमीन पर पुआल फैलाकर टाट का बिछावन बना दिया गया और एक खपरैल में खाना बनाने की व्यवस्था करदी गई। उन दिनों अमरोहा में पानी के लिये हाथ के नल अथवा कुएं पर ही आश्रित होना पड़ता था। हमारे हाते में कुएं के साथ

Queen Elizabeth II : एक कॉर्गिस प्रेमी का जाना

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 8 सितंबर को महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के साथ-साथ एक कॉर्गिस प्रेमी युग का भी अंत हो गया। एलिजाबेथ के लिए कॉर्गिस हमेशा परिवार का एक सदस्य बनकर रहा। वह महारानी के जीवन का एक पूरा हिस्सा था। सिंहासन पर 70 साल बिताने के अलावा एलिजाबेथ द्वितीय ने अपने पूरे जीवन में कई रिकॉर्ड बनाए हैं उनमें से एक है जो उनकी सभी उपलब्धियों को मात देता है। यह, कॉर्गी कुत्तों के लिए महारानी का प्रेम था। महारानी ने अपने पति फिलिप्स से भी ज्यादा समय( 85 वर्ष) कार्गी के साथ बिताया। लिटिल लिलिबेट का पहला प्यार 'डूकी'  जब लिटिल प्रिंसेस लिलिबेट दस साल की भी नहीं थी, तभी से कार्गी के प्रति एलिजाबेथ का लगाव शुरू हुआ। यह 1930 का दशक था। बेशक, उनके माता-पिता यॉर्क के ड्यूक और डचेस के पास पहले से ही कुत्ते थे, लेकिन युवा एलिजाबेथ के लिए शराबी और प्यारे कॉर्गिस से ज्यादा सुंदर कोई नस्ल दूसरी नहीं थी। राजकुमारी ने पहली बार इस नस्ल के कुत्तों को मार्क्विज़ ऑफ़ बाथ के घर में देखा था, जहाँ वे अक्सर पूरे परिवार के साथ जाते थे। इसके बाद ड्यूक अपनी राजकुमारियों के लिए एक कार्गी खरीदकर लाए जिसे यॉर्क परिवार ने अपने कुत्

15 August Special: काकोरी कांड का बिजनौर कनेक्शन, जहां पर आजाद ने सीखी थी निशानेबाजी - Hindustan Posts

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पश्चिम यूपी का जिला बिजनौर न केवल अपनी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, पौराणिक पहचान के रूप में प्रसिद्ध है बल्कि स्वतंत्रता समर में अपनी अग्रणी भूमिका निभाने के लिए भी बिजनौर को याद किया जाता है। स्वाधीनता संग्राम का प्रत्यक्ष गवाह रहा बिजनौर का सम्बन्ध प्रसिद्ध काकोरी काण्ड से रहा। 9 अगस्त 1925 को लखनऊ के निकट काकोरी स्टेशन पर सरकारी खजाने से चोरी करके क्रान्तिकारियों ने ब्रिटिश सरकार की चूल्हे हिला दी थी। काकोरी कांड से जुड़े कई क्रान्तिकारियों ने अज्ञातवास के दौरान क्रान्तिकारी शिवचरण त्यागी के निवास पर बिजनौर के पैजनिया गांव में शरण ली थी।  काकोरी घटना के बाद क्रान्तिकारी लोग ब्रिटिश शासन के अधीन हो गए थे। ब्रिटिश सरकार की पुलिस लगातार हमले कर रही थी। ऐसे में कानपुर के जाने माने देशभक्त पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के निर्देश पर  क्रान्तिकारी  शहर पैजानियां पहुंचे जहां क्रान्तिकारी शिवचरण त्यागी ने उन्हें अपने घर में रखा था। शिवचरण त्यागी के पोते भोला नाथ त्यागी ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया था कि ठाकुर रोशन सिंह और अशफाक उल्ला खान, गणेश शंकर विद्यार्थी के साथ, सबसे पहले पैजानिया शहर प