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कूपमंडूकता से लेकर विज्ञानवाद तक।

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कहते हैं- " साहित्य समाज का आईना होता है।"   अगर किसी देश के बारे में जानना है तब उसके साहित्य, कला, विज्ञान, परिक्षेत्र, संस्कृति को जानना आवश्यक है। इन्हींं के द्वारा किसी राष्ट्र के संजोए गए मूल्यो का पता चलता है। उपनिवेशवाद की डोर पकड़ कर चलने वाले यूरोप ने इसको सबसे पहले भांप लिया था। जैसाकि विदित है, विज्ञानवाद का जन्म यूरोप से हुआ। यूरोप ने भारत जैसे उपनिवेशवाद से घिरे राष्ट्रों में इसे अरसे तक पहुँचाया। हांलाकि यह पूर्ण सत्य नहीं है। भारतवर्ष में सर्वप्रथम पांचवी सदी के महान भारतीय गणितज्ञ आर्यभट्ट ने शून्य वाद का सिद्धांत पहले ही दे दिया था, जिसको यूरोप ने भी माना। खगोल विज्ञान की दृष्टिसे  भारतीय  खगोलविद आर्यभट ने विश्व में सबसे पहले यह सिद्धांत रखा था कि  पृथ्वी  अपनी धुरी पर 24 घण्टे में एक बार घूमती है ।सोलहवीं सदी में कोपरनिकस ने फिर से  सूर्य  केंद्रित सौर मंडल स्थापित किया स्वभावतः इसमें  पृथ्वी  भी  सूर्य  के ईर्द गिर्द घूमती ही है। लेकिन बड़े अचरज की बात है कि हम कोपरनिकस को ही सूर्य- पृथ्वी सिद्धांत का प्रतिपादक मानते हैं जबकि इससे पहले आर्यभट्

सबक लाॅकडाउन के

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  सबक लाॅकडाउन के । लाॅकडाउन को लगे आज देशभर में पूरा एक महीना बीत चुका है लेकिन कोरोना महामारी का भयावह डर तनिक भी कम नहीं हुआ। डब्ल्यूएचओ और राष्ट्रीय स्तर पर लगातार एडवाइजरी जारी की जा रही है ताकि हम कड़ी सतर्कता बरतते रहे और संशय होने पर उचित इलाज करा सके। समय की बंदिशो ने बता दिया कि मनुष्य परिस्थितियों के आधीन हैं। लेकिन परिस्थितियों से गुजारना मनुष्य की वास्तविक परीक्षा है। कुछ इसी तरह की परीक्षाओं से लगातार हमारे सेवा कर्मियों ,डॉक्टरों ,एनजीओ, पुलिसकर्मियों, सुरक्षाकर्मियों सफाई कर्मियों आदि सभी को गुजरना पड़ रहा है। इस दौरान विभिन्न स्वयंसेवक संघ सामने आए हैं जो इस प्रतिकूल घड़ी में हमें अपनी सेवा प्रदान कर रहे हैं। लेकिन हमें कुछ बिंदुओं पर अवश्य ध्यान देना होगा-: आवश्यक कदम  बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों का पलायन दुखद रहा इसको देखते हुए सरकार को उनके लिए स्थाई रोजगार की व्यवस्था करनी चाहिए। एवं  कंपनी रेगुलेशन एक्ट  के तहत उनके रोजगार का संरक्षण करने की जिम्मेदारी भी   लेनी चाहिए। जिससे उन्हें ऐसी स्थिति खड़ी होने पर पलायन न करना पड़े। दूसरा महत