संदेश

राजनीतिक । लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

समाजवाद और पूंजीवाद की बागडोर ।

चित्र
आज जहां पूरा विश्व कोरोना नामक महामारी से जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर समाजवाद और पूंजीवाद नामक दो दर्शन फिर से नितांत जीवित हो उठे।वैश्विक महाशक्ति बनने एवं पूंजीवाद के मोह में एक बार फिर से विश्व द्वंद्वात्मक युद्ध की गर्त में फस गया है, कि आखिर उसे समाजवाद को अपनाना चाहिए या पूंजीवाद को। "न मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचित" अर्थात मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। यह पंक्ति समाजवाद की धारा को स्पष्ट रूप से परिभाषित करती है कि संसाधनों का दोहन किसी स्वामित्व के हाथ में न हो, इसका आधार मानवोंपरि सेवकपरक होना चाहिए।  लेकिन क्या वास्तव में लोगों के हाथ में सत्ता  थमा देना वाजिब है ?आखिर समाजवाद और पूंजीवाद का सही इस्तेमाल न होना ही कोरोना जैसी महामारी को जन्म देता है। ब्रिटिश राजनीतिक विज्ञानी  सी० ई० एम०   जोड  ने कभी समाजवाद को एक ऐसी टोपी कहा था जिसे कोई भी अपने अनुसार पहन लेता है। वास्तव में समाजवाद की शुरुआत  यूरोप में सन  18 वीं शताब्दी के तीसरे और चौथे दशक से मानी जाती है लेकिन उस समय ब्रिटेन में दो ऐसे गुट थे जो समाजवाद और पूंजीवाद के समर्थक थे