संदेश

राजनीतिक लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Ram Manohar Lohia: संसद में समाजवादी लोहिया के द्वारा दिया गया वो ऐतिहासिक भाषण

चित्र
समाजवादी राम मनोहर लोहिया गतिशील राजनीतिक विचारों के व्यक्ति थे। वह जनता के सच्चे अर्थों में जननायक थे सदैव उसी भाषा में संवाद किया करते। राष्ट्रवाद के हिमायती लोहिया नवयुवकों और नवयुवतियों को पश्चिम की नकल करने के सख्त खिलाफ थे वह भाषा और सभ्यता को लेकर स्पष्ट विचारों के समर्थक थे अंग्रेजी भाषा के प्रति मोह को लोहिया ने 'पापमय मोह' की संज्ञा दी थी। 'तीन आने बनाम पन्द्रह आने' वाद-विवाद में लोहिया के तर्क इतने मजबूत थे कि उन्होंने तत्कालीन सरकार पर लोगों को गुमराह करने का तमगा लगा दिया था।  सन् 1967 में लोहिया का स्वर्गवास हो गया। लोहिया के जाने से संसद में उनकी कमी हमेशा खलती रही। संसद में उनकी मौजूदगी का हर व्यक्ति सम्मान करता था। लोहिया के द्वारा सन् 1964 में संसद में दिया गया एक भाषण आज भी लोकप्रिय है। लोहिया ने अपने इस भाषण में तत्कालीन सरकार की विदेश नीति और वामपंथ की अधूरी कसौटी की किस तरह से व्याख्या की वह प्रशंसनीय है जिसमें लोहिया कहते हैं, एक जमाना था, जब हिन्दुस्तान की विदेशी नीति दुनिया के दरबारों और बाजारों में जरा अकड़ कर चला करती थी। आज न जाने किस बोझ से,

JP Birthday : लोकनायक जयप्रकाश नारायण को याद करते हुए..​​

चित्र
लोकनायक जयप्रकाश नारायण स्वयं में एक आंदोलन थे वो  महात्मा गांधी के अग्रिम पंक्ति के सिपाही थे, उन्होंने कभी सत्ता की तलाश नहीं की। इंदिरा गांधी के राजनीतिक करीबी होने से पहले, जेपी को केंद्रीय कैबिनेट मंत्री, प्रधान मंत्री और भारत के राष्ट्रपति के पदों की पेशकश की गई लेकिन उन्होंने इन सभी अवसरों को ठुकरा दिया।आपातकाल के चरम पर जब इंदिरा गांधी ने देश पर तंज कसते हुए कहा कि 'आजादी से ज्यादा जरूरी खाना है', सर्वोदय नेता जेपी ने नारा दिया; स्वतंत्रता मेरे जीवन की रोशनी में से एक चिंगारी बन गई है। यह स्वतंत्रता मेरे जीवन का जुनून बन गया है और मैं इसे लिए किसी भी मूल्य पर राजी नहीं हूं।  जेपी के लिए स्वतंत्रता की खोज न्यायसंगत और न्यायपूर्ण व्यवस्था की खोज थी 'द ड्रीम आफ रिवोल्यूशन ए बायोग्राफी आफ जयप्रकाश नारायण' के लेखक बिमल प्रसाद की बेटी और किताब की सहलेखक सुजाता प्रसाद लिखती हैं,  जयप्रकाश की स्वतंत्रता की खोज और एक न्यायसंगत और न्यायपूर्ण व्यवस्था सर्वोत्कृष्ट क्रांतिकारी खोज थी। उनके विचार निरंतर अशांति की स्थिति में थे, और खोज ने उन्हें गांधी से मार्क्स तक और फिर गां

Mulayam Singh Yadav: अमरोहा से भी रहा नेताजी मुलायम सिंह यादव का खास जुड़ाव

चित्र
बीते सोमवार सुबह नेताजी और धरती पुत्र के नाम से जाने जाने वाले जननेता समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव का गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में निधन हो गया। इस गमगीन माहौल में हर कोई नेताजी से जुड़ी याद साझा कर रहा है। इसी कड़ी में अमरोहा से भी उनकी कई यादें जुड़ी हैं। अमरोहा के गजरौला को एक गांव से औद्योगिक नगरी में तब्दील करने का श्रेय मुलायम सिंह यादव को ही जाता है। रमाशंकर कौशिक के निवेदन पर ही सन् 1980 के दशक में गजरौला को औद्योगिक नगरी घोषित किया गया था। सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के घनिष्ठ सहयोगी रहे स्वर्गीय रमाशंकर कौशिक प्रदेश स्तर की राजनीति में काफी समय तक एक प्रभावशाली भूमिका में रहे। इनके प्रयासों से यहां औद्योगिक इकाइयां लगती गईं।  मुलायम सिंह यादव जिला अमरोहा के गांव पपसरा निवासी स्वर्गीय चंद्रपाल सिंह के बेहद करीबी माने जाते हैं। सन् 1989 में मुलायम सिंह यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो वह पूर्व कैबिनेट मंत्री चंद्रपाल सिंह से मिलने उनके गांव पपसरा पहुंचे थे। एक और किस्सा जब 2015 में जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव की कुर्सी पर काबिज होने के लिए कैबिनेट मं

कृष्ण मेनन : एक विवादित राजनेता

चित्र
कृष्ण मेनन भारतीय राजनीति में अब तक सबसे विवादित चेहरों में से एक रहे हैं। मेनन रूढ़िवादी प्रकृति के तो थे ही, 1962 के युद्ध हार जाने के बाद उनकी लोकप्रियता हमेशा के लिए धूमिल हो गई। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कृष्णा मेनन द्वारा दिया गया 8 घंटे का भाषण आज तक का लंबा भाषण माना जाता है। सन् 1957 में मेनन मुंबई से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे।  दिसंबर 1961 में गोवा का एकीकरण और चीन के साथ युद्ध, ये दो सबसे महत्वपूर्ण अवसर रहे जब रक्षा मंत्री के रूप में कृष्ण मेनन ने विश्व का ध्यान अपनी और खींचा। मेनन का विचार था कि यदि भारत ने 1947 में ही पुर्तगालियों को किसी विदेशी देश में भेज दिया होता, तोक  दुनिया के भीतर किसी भी देश ने कुछ नहीं कहा होता; उनका मानना ​​था कि गोवा औपनिवेशिक मुक्ति पर आश्रित हो गया है। अक्टूबर 1959 में बॉम्बे में एक सार्वजनिक सभा में, उन्होंने घोषणा की: "गोवा हमारा क्षेत्र है। हमें इसे मुक्त कराने की आवश्यकता है यह हमारे अधूरे व्यवसाय का एक हिस्सा है।"     कृष्ण मेनन ने स्थिति में हेरफेर किया और और गोवा को पुर्तगालियों से मुक्त कराने की एक तारीख़ रखी। इतनी स

Chandra Shekhar Special: चंद्रशेखर को और मौके मिलते तो वे सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्रियों में से होते

चित्र
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ में सामयिक इतिहास ने न्याय नहीं किया. करीब चार साल पहले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का संस्मरण आया था जिसमें उन्होंने लिखा था "अगर चंद्रशेखर को और मौका मिला होता तो वो देश के सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्रियों में से एक साबित हुए होते." जब वेंकटरमन राष्ट्रपति और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने भी कहा कि चंद्रशेखर के पास अगर बहुमत होता तो बेहतर होता. क्योंकि एक तरफ वो अयोध्या में हल निकालने की कोशिश कर रहे थे तो दूसरी तरफ सिख समस्या को सुलझाने की कोशिशों में लगे थे. कश्मीर में सकारात्मक कदम उठाए जा रहे थे. असम में चुनाव कराए गए.  सिर्फ चार महीने की सरकार इतने बड़े काम लेकर निर्णायक रूप से आगे बढ़ रही थी और यही कांग्रेस को अखर रहा था. चंद्रशेखर सफलता की ओर और ज्यादा न बढ़े इसलिए कांग्रेस ने सरकार को गिरा दिया. जबकि इस वादे के साथ चंद्रशेखर ने शपथ ली थी कि, कम से कम एक साल तक सरकार को चलने दिया जाएगा. कांग्रेस के डरने के पीछे भी अहम कारण थे. दरअसल चंद्रशेखर का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था, एक प्रसंग है - चंद्रशेखर ने ऑपरेशन ब्लूस्टार को "हिमालयन

ब्लॉग: वो दो शख्सियतें जिन्हें इन्दिरा ताउम्र नहीं भुला पाईं - Hindustan Posts

चित्र
वर्ष था 1975। प्रयागराज जिसे गंगा और यमुना नदियों के संगम के स्थान के रूप में जाना जाता है वो अब प्रतिद्वंद्वी सियासत का सबब बनने जा रहा था।मामला मार्च 1971 में हुए आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी को जबरदस्त मिली जीत को लेकर था।भारत की आजादी के बाद से, सत्तारूढ़ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस रायबरेली से कभी चुनाव नहीं हारी थी। इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी ने 1951-52 में भारत के पहले चुनाव में वह सीट जीती थी, और उन्होंने पांच साल बाद अपने प्रदर्शन को दोहराया था।अब इंदिरा की बारी थी कि वे इस निर्वाचन क्षेत्र पर एक बार फिर से अपनी दावेदारी पेश करें। वहीं राजनारायण के व्यक्तित्व के बावजूद यह उनके लिए अच्छा मौका था। यदि राजनारायण चुनाव जीतते तो यह सम्भव था कि गांधी परिवार अपने दामन प्रिय निर्वाचन क्षेत्र को हमेशा के लिए खो बैठता। लेकिन चुनाव में राज नारायण हार गए, उन्हें कुल मतों का केवल एक चौथाई हिस्सा हासिल हुआ, इंदिरा गांधी ने उन्हें दो-तिहाई मतों के साथ पछाड़ दिया।राजनीतिक नुकसान से निराश होकर, राज नारायण ने ट्रैक बदल दिया, और लड़ाई को कानूनी क्षेत्र में स्थानांतरित करने का फैसला किया। उन

रतन टाटा और शिव नाडर हिंदी में क्यों बोलते हैं?- Hindustan Posts

चित्र
जब कॉरपोरेट इंडिया के महापुरूष रतन टाटा और एचसीएल के फाउंडर चेयरमैन शिव नाडर किसी विषय पर बोलते हैं तो आपको सुनना पड़ता है। वे असल में भारतीय कॉरपोरेट जगत के रखवाले हैं। उन्होंने अपने क्षेत्र में जो हासिल किया है, वह अचंभित कर देने वाला है। यदि हिंदी के जाने-माने विरोधी और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन करुणानिधि अपने राज्य के लोगों पर हिंदी थोपने के खिलाफ बोलते हैं, तो शिव नाडर अपने करियर को बनाने में हिंदी की भूमिका के बारे में क्या कहते हैं, इस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। कुछ साल पहले तिरुचिरापल्ली में सेंट जोसेफ कॉलेज हायर सेकेंडरी स्कूल के छात्रों को संबोधित करते हुए, एचसीएल टेक्नोलॉजीज के संस्थापक ने छात्रों को यह याद दिलाने की कोशिश की कि, भारत एक बड़ा देश था और देश में आबादी का महत्वपूर्ण वर्ग हिंदी समझता था। उन्होंने आगे कहा- "हिंदी सिर्फ भारतीय राज्यों में ही नहीं बोली जाती। इसे विभिन्न देशों के लोग समझते हैं क्योंकि भारतीय हर जगह हैं। जब आप दूसरे देशों में जाते हैं तो इससे आपको मदद मिलेगी।" अरबपति और नेक दिल उद्योगपति शिव नाडर ने भी इस बात को रेखांकित किया कि उन

Chandra Sekhar Singh Jayanti: चंद्रशेखर को और मौके मिलते तो वे सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्रियों में से होते

चित्र
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ में सामयिक इतिहास ने न्याय नहीं किया. ढाई साल पहले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का संस्मरण आया था जिसमें उन्होंने लिखा था अगर चंद्रशेखर को और मौका मिला होता तो वो देश के सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्रियों में से एक साबित हुए होते.  जब वेंकटरमन राष्ट्रपति थे और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने भी कहा कि चंद्रशेखर के पास अगर बहुमत होता तो बेहतर होता. क्योंकि एक तरफ वो अयोध्या में हल निकालने की कोशिश कर रहे थे तो दूसरी तरफ सिख समस्या को सुलझाने की कोशिशों में लगे थे. कश्मीर में सकारात्मक कदम उठाए जा रहे थे. असम में चुनाव कराए गए.  सिर्फ चार महीने की सरकार इतने बड़े काम लेकर निर्णायक रूप से आगे बढ़ रही थी और यही कांग्रेस को अखर रहा था. चंद्रशेखर सफलता की ओर और ज्यादा न बढ़े इसलिए कांग्रेस ने सरकार को गिरा दिया. जबकि इस वादे के साथ चंद्रशेखर ने शपथ ली थी कि, कम से कम एक साल तक सरकार को चलने दिया जाएगा. कांग्रेस के डरने के पीछे भी अहम कारण थे. दरअसल चंद्रशेखर का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था, एक प्रसंग है -  चंद्रशेखर ने ऑपरेशन ब्लूस्टार को "हिमालयन ब्लंडर"

बापू मुझे माफ़ करना मैं भगत सिंह को माफीनामे के लिए मना नहीं सका

चित्र
शहीद भगत सिंह की फांसी से होने वाले विद्रोह को लेकर ब्रिटिश सरकार कांप कर रही थी दरअसल भगत सिंह की शहादत के बाद देशभर में होने वाले विद्रोह की ताकत को ब्रिटिश सरकार भली-भांति जानती थी इसलिए ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि किसी भी तरह भगत सिंह ब्रिटिश सरकार से माफ़ी मांग लें इससे विद्रोह भी नहीं होगा और हमारी शान में कसीदे भी पढ़े जाएंगे.. इसके लिए खुरापाती योजना बनाई गई।  तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन ने गांधीजी के समक्ष भगत सिंह की फांसी को स्थगित करने या स्थाई तौर पर रोकने का प्रस्ताव रखा। भगत सिंह की फांसी को रोकना ... वायसराय के मुंह से प्रस्ताव सुनकर गांधी जी कुछ देर अचरज में पड़ गए। गांधीजी ने पूछा कि, क्या यह बिना किसी शर्त के मंजूर है? तब वायसराय ने कहा, आपको केवल इतना करना है, भगत सिंह का बयान लिखित में लेना है। गांधी जी बोले कैसा बयान? "बस यही कि मैंने जो ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध अब तक षड्यंत्र किया, मैं उसके लिए माफी चाहता हूं बस..!!" गांधीजी ने कहा मैं कैसे कह सकता हूं कि भगत सिंह की इस बारे में राय क्या है ? वायसराय बोले ठीक है मैं आपको 1 वर्ष का समय देता हूं। गांधी जी

KashmiriPandits: कश्मीरी पंडितों की त्रासदी का जिम्मेदार कौन कांग्रेस या भाजपा ?

चित्र
इतिहास में कोई भी घटना यकायक नहीं होती, त्रासदी अपने पीछे एक कालखंड रखती है। फिल्म डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री की मूवी 'द कश्मीर फाइल्स' आने के बाद से छलकुट वर्ग में उपद्रव का माहौल है। होली पर जल बचाने की नसीहत देकर साम्प्रदायिकता फैला रहे वाकपटुते इस फिल्म से साम्प्रदायिक सद्भाव का रोना रो रहे हैं। वहीं कांग्रेस ने भी अपने साम्प्रदायिक अंदाज में इस नरसंहार में मरने वाले लोगों का ठीकरा भाजपा सरकार पर फोड़ा है। कुछ लोग कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए भाजपा सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। अब जब इस पर बहस चल रही है तो यह जान लेना भी आवश्यक है कि इस त्रासदी को खड़ा करने के पीछे आखिर किसका हाथ था?  बात इन्दिरा गांधी के कार्यकाल की है जब 1971 के युद्ध में पाकिस्तान न केवल भारत से हार गया, बल्कि दो हिस्से में बंट गया। यह वो दौर था जब अब्दुल्ला और कश्मीर भारत के करीब आ गए थे। सन् 1972 में, अब्दुल्ला ने "भारत सरकार के साथ हमारा विवाद" की घोषणा की,यह विवाद भारत के साथ विलय के बारे में नहीं बल्कि स्वायत्तता के बारे में था। उसके बाद सन्1975 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और

बुद्धि पक्ष की अवहेलना से केवल विनाश हुआ!

चित्र
फिल्म दीदार-ए-यार (1982) का एक गाना है, " सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता, निकलता आ रहा है आफ़्ताब आहिस्ता आहिस्ता'' शायर अमीर मीनाई ने इसे लिखा है मामला नक़ाब से जुड़ा है इसलिए याद आया..!! देश आज कट्टरवाद के बीच में झूल रहा है। दक्षिण पंथियों द्वारा लता जी के निधन पर शाहरुख खान को लेकर जिस प्रकार की टिप्पणियां देखने को मिलीं उनसे यही अपेक्षा की जा सकती है लेकिन वामपंथी इनसे भी ऊंचे निकले इनकी मानें तो लता जी के निधन पर श्रद्धांजलि देना व्यर्थ का काम है क्योंकि वो 92 वर्ष की उम्र में आयु पूरी करके गयी हैं। आज देश दो खेमों में बट गया हैं, वामपंथ और दक्षिणपंथ। मुद्दा कोई भी हो, दोनों तरफ के कट्टरपंथी तैयार मिलते हैं। सेकुलरिज्म का प्रवचन सुनाने वाली कांग्रेस आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। हिजाब मामले में राहुल का बयान केवल विपक्ष के तौर पर ही है, एक लीडर के तौर पर नहीं। उधर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा का भी इस मामले में ढ़ीला-ढाला रवैया देखने को मिला है। उनका कहना है, "चाहे बिकनी हो, घूंघट हो, जींस हो या फिर हिजाब, यह तय करना एक महिला का अधिकार ह

आजादी के 74 वर्ष, कहां तक पहुँचे हम ?

चित्र
आजाद भारत को आज 74 वर्ष पूरे हो चुके हैं। कोरोना काल के चलते देश पूरे उत्साह के साथ इस दिवस को मना रहा है। तरह-तरह की कवायद हो रही है। भारतीय इतिहास का यह एक ऐसा दिन है जिसे देखने के लिए गाँधी का सत्याग्रह, शहीद भगत सिंह की कुर्बानी, और लाखो राष्ट्रवादियों का बलिदान ताक पर रखा गया। जहां अल्लामा इकबाल की शायरियां गूंजी , जहां चाचा नेहरू की वकालत, जहां हिंदू मुस्लिम एकता को मिसाल देने वाली पंडित बिस्मिल और अशफाक उल्ला की दोस्ती की कहानी गढ़ी गई, इन सबने भारतवर्ष को एक नई शक्ति प्रदान की । जिसके कारण आज हम इस दिन के साक्षी बन पाए। हम नहीं जानते कितने वर्गों ने, बंधुओं ने भारत की आजादी में सहयोग दिया ? मगर वह सब भारत की आजादी मे ताबूत साबित हुए। हमने अन्धकार का वो समय भी देखा जब हम गुलामी की चरमपंथी विचारधारा से गुजर रहे थे और हमने विश्व कल्याण के मन्त्र को ध्यान मे रखते हुए, अन्य देशो को आजादी के लिए अपनी सेना उपलब्ध कराई लेकिन प्रशंसा की जगह हमे उपहास का पात्र बनना पड़ा । सन् 1930 का वो अकाल दशक जब खाने के लिए हमारे पास सूखी गेंहू तक भी नही थी तब भी हम आजादी का झंडा बुलंद कर रहे थे।

रंगभेद या मनभेद भी !

चित्र
अमेरिका में पुलिस हिरासत में एक अफ्रीकी-अमेरिकी व्यक्ति की मौत के बाद अमेरिका में बड़े पैमाने पर हुए विरोध प्रदर्शनों के बीच, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर ने कुछ ऐसा करने का फैसला किया, जिसे कई सालों तक टाला गया था। ट्विटर ने बताया कि, डोनाल्ड ट्रम्प के ट्वीट गलत जानकारी और इसकी नीतियों के खिलाफ हैं। इसने मिस्टर ट्रम्प को एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से सख्त नियंत्रण के सोशल मीडिया प्लेटफार्मों को चेतावनी देने के लिए प्रेरित किया।   मामला यह था जार्ज फ्लायड की अमेरिकी पुलिस द्वारा बर्बर हत्या के बाद पूरे अमेरिका महाद्वीप के 100 शहरो से भी अधिक मे हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए, नतीजतन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हिंसा कर रहे विद्रोहियो को सख्त लहजे मे कहा - " कि आप अमेरिका मे चर्च नही जला सकते " डोनाल्ड ट्रम्प के ट्वीट ने जमकर हंगामा किया। ट्रंप कई बार अपने इस रवैये के चलते दुनिया मे अलोचना का शिकार बन चुके हैं। हो सकता है इसकी भरपाई आने वाले अमेरिकी चुनाव के दौरान चुकानी पड़े। चाणक्य ने भी कहा है - एक राजा को क्रोध, लोभ, मोह, ईष्र्या द्वेष, भाव आदि से मुक्त होकर निर्णय ले

शराबबंदी का सच।

चित्र
शराबबंदी का सच - लॉकडाउन के तीसरे चरण में जहां राज्य सरकारों के दबाव में आकर, केंद्र सरकार ने शराब बिक्री के लिए विक्रेताओं को छूट दे दी,वहीं दूसरी तरफ सुनार, साइबर कैफे, घरेलू आवश्यकता पूर्ति को इससे अलग रखा गया। केन्द्र सरकार ने जब राज्य सरकारो को शराब बिक्री को लेकर कुछ देर और पाबंदी लगी रहने का सुझाव दिया, तो राज्य सरकारें हिमालय पर्वत की तरह एकजुट होकर केंद्र सरकार पर दबाव बनाने लगी दलील यह दी गई - यदि केंद्र सरकार शराब से प्रतिबंध नहीं हटाती है तो राज्य सरकारों का खजाना जल्दी ही खाली हो जाएगा ,जिसके लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार मान जाएगा। अब केंद्र सरकार भी इतना घाटा नहीं छेल सकती और वह भी मनगढ़ंत आरोपों से बचना चाहती है इसलिए उसने शराब बिक्री को लेकर लॉकडाउन  में छूट दे दी है ।इस छूट का निष्कर्ष यह निकला कि तमाम देश भर में लाॅकडाउन का उल्लंघन हुआ कोरोना केसेस में बढ़ोतरी होती गई। और जाहिर है की अभद्रता का नाता तो शराब से इस प्रकार जुड़ा है जैसा चरत-भरत के खून जैसा।  खैर शराब बिक्री से राज्य सरकारों को टैक्स प्राप्त होगा, अब जिससे उन्हें राजस्व में बढ़ोतरी मिलेगी।हाल ही में रा

नेहरू -लियाकत अली समझौता।

चित्र
14 अगस्त सन 1947 में पाकिस्तान के बन जाने के बाद भारत के लिए तत्कालीन समस्या पूर्वी पाकिस्तान (जो वर्तमान में बांग्लादेश ) से हिन्दुओं एवं बंगाल विभाजन के बाद बने पश्चिम बंगाल से मुस्लिमों का पलायन शुरू हो गया था। पलायन इतनी बड़ी तादाद में था कि आधी आबादी भारत में ही बसना चाहती थी। महात्मा गांधी के द्वारा दिए गए आश्वासन  से जरूर पलायन कर रहे लोगों में अंतर दिखाई दिया। महात्मा गांधी ने कहा था कि जो लोग पाकिस्तान में हैं वह पाकिस्तान में ही रहें ताकि हिंसा और बड़े स्तर तक ना फैल पाए। भारत ने सहिष्णुता की भावना को दिखाते हुए सभी धर्मों को समान भाव से देखा और अपने संविधान में पंथनिरपेक्ष शब्द  जोड़कर विश्व समुदाय को अपना दर्शन कराया।  हांलाकि यह कार्य सन 1976 में 42 वें संविधान संशोधन के द्वारा क्या गया लेकिन इसकी भावना सैकड़ों सालों से थी। जबकि इसके विपरीत भारत से अलग हुए राष्ट्र पाकिस्तान  में अल्पसंख्यकों का दमन लगातार जारी रहा। वहीं पाकिस्तान ने अपने संविधान में इस्लाम धर्म को स्वीकृत किया। जिसके कारण अल्पसंख्यको यानी हिंदुओं को और अधिक दमन का सामना करना पड़ा। लोगों क

चुनावी बॉन्ड पर सवाल क्यों ?

चित्र
चुनावी बॉन्ड   चुनावी बांड कुछ इस प्रकार से होता है कि यदि आप 15 दिनों की अवधि वाला बॉन्ड खरीदने के लिए एसबीआई बैंक जाते हैं तो आपको यह छूट दी गई है कि यह आप किसी भी राजनीतिक दल को बॉन्ड दान कर सकते हैं आपकी इसमें पूर्ण गोपनीयता रखी जाएगी ना तो आपको खरीदने के बारे में और ना ही किसी दल के बारे में खुलासा करना है ऐसे में राजनीतिक दल अपनी जिम्मेदारी से भी बच जाते हैं जबकि उन्हें सब पता होता है कि राजनीतिक चंदा किसने दिया है ।  चुनावी बांड के बारे में पहली बार जिक्र फरवरी 2017 में पेश आम बजट में आया था चुनावी बांड को जनवरी 2018 में लांच किया गया था । एक गैर सरकारी संगठन यानी एनजीओ ने उसके अगले ही महीने एक रिट याचिका दायर की थी और इसे चुनौती दी इस बांड के जरिए और यूरोपीय राजनीतिक दलों की तिजोरी में पहुंच गए हैं इस दौरान के राज्यों में विधानसभा स्थानीय निकायों के चुनाव संपन्न हो चुके हैं अब लोकसभा चुनावों की प्रक्रिया शुरू होने के बाद इस पर विचार किया जाना था लेकिन ऐसा नहीं हो सका  मामलों पर सुनवाई को फिर से स्थगित कर दिया गया समस्या -: आम भाषा में समझे तो चुनावी बांड कुछ इ