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रतन टाटा और शिव नाडर हिंदी में क्यों बोलते हैं?- Hindustan Posts

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जब कॉरपोरेट इंडिया के महापुरूष रतन टाटा और एचसीएल के फाउंडर चेयरमैन शिव नाडर किसी विषय पर बोलते हैं तो आपको सुनना पड़ता है। वे असल में भारतीय कॉरपोरेट जगत के रखवाले हैं। उन्होंने अपने क्षेत्र में जो हासिल किया है, वह अचंभित कर देने वाला है। यदि हिंदी के जाने-माने विरोधी और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन करुणानिधि अपने राज्य के लोगों पर हिंदी थोपने के खिलाफ बोलते हैं, तो शिव नाडर अपने करियर को बनाने में हिंदी की भूमिका के बारे में क्या कहते हैं, इस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। कुछ साल पहले तिरुचिरापल्ली में सेंट जोसेफ कॉलेज हायर सेकेंडरी स्कूल के छात्रों को संबोधित करते हुए, एचसीएल टेक्नोलॉजीज के संस्थापक ने छात्रों को यह याद दिलाने की कोशिश की कि, भारत एक बड़ा देश था और देश में आबादी का महत्वपूर्ण वर्ग हिंदी समझता था। उन्होंने आगे कहा- "हिंदी सिर्फ भारतीय राज्यों में ही नहीं बोली जाती। इसे विभिन्न देशों के लोग समझते हैं क्योंकि भारतीय हर जगह हैं। जब आप दूसरे देशों में जाते हैं तो इससे आपको मदद मिलेगी।" अरबपति और नेक दिल उद्योगपति शिव नाडर ने भी इस बात को रेखांकित किया कि उन

Chandra Sekhar Singh Jayanti: चंद्रशेखर को और मौके मिलते तो वे सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्रियों में से होते

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पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ में सामयिक इतिहास ने न्याय नहीं किया. ढाई साल पहले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का संस्मरण आया था जिसमें उन्होंने लिखा था अगर चंद्रशेखर को और मौका मिला होता तो वो देश के सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्रियों में से एक साबित हुए होते.  जब वेंकटरमन राष्ट्रपति थे और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने भी कहा कि चंद्रशेखर के पास अगर बहुमत होता तो बेहतर होता. क्योंकि एक तरफ वो अयोध्या में हल निकालने की कोशिश कर रहे थे तो दूसरी तरफ सिख समस्या को सुलझाने की कोशिशों में लगे थे. कश्मीर में सकारात्मक कदम उठाए जा रहे थे. असम में चुनाव कराए गए.  सिर्फ चार महीने की सरकार इतने बड़े काम लेकर निर्णायक रूप से आगे बढ़ रही थी और यही कांग्रेस को अखर रहा था. चंद्रशेखर सफलता की ओर और ज्यादा न बढ़े इसलिए कांग्रेस ने सरकार को गिरा दिया. जबकि इस वादे के साथ चंद्रशेखर ने शपथ ली थी कि, कम से कम एक साल तक सरकार को चलने दिया जाएगा. कांग्रेस के डरने के पीछे भी अहम कारण थे. दरअसल चंद्रशेखर का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था, एक प्रसंग है -  चंद्रशेखर ने ऑपरेशन ब्लूस्टार को "हिमालयन ब्लंडर"

बापू मुझे माफ़ करना मैं भगत सिंह को माफीनामे के लिए मना नहीं सका

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शहीद भगत सिंह की फांसी से होने वाले विद्रोह को लेकर ब्रिटिश सरकार कांप कर रही थी दरअसल भगत सिंह की शहादत के बाद देशभर में होने वाले विद्रोह की ताकत को ब्रिटिश सरकार भली-भांति जानती थी इसलिए ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि किसी भी तरह भगत सिंह ब्रिटिश सरकार से माफ़ी मांग लें इससे विद्रोह भी नहीं होगा और हमारी शान में कसीदे भी पढ़े जाएंगे.. इसके लिए खुरापाती योजना बनाई गई।  तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन ने गांधीजी के समक्ष भगत सिंह की फांसी को स्थगित करने या स्थाई तौर पर रोकने का प्रस्ताव रखा। भगत सिंह की फांसी को रोकना ... वायसराय के मुंह से प्रस्ताव सुनकर गांधी जी कुछ देर अचरज में पड़ गए। गांधीजी ने पूछा कि, क्या यह बिना किसी शर्त के मंजूर है? तब वायसराय ने कहा, आपको केवल इतना करना है, भगत सिंह का बयान लिखित में लेना है। गांधी जी बोले कैसा बयान? "बस यही कि मैंने जो ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध अब तक षड्यंत्र किया, मैं उसके लिए माफी चाहता हूं बस..!!" गांधीजी ने कहा मैं कैसे कह सकता हूं कि भगत सिंह की इस बारे में राय क्या है ? वायसराय बोले ठीक है मैं आपको 1 वर्ष का समय देता हूं। गांधी जी

KashmiriPandits: कश्मीरी पंडितों की त्रासदी का जिम्मेदार कौन कांग्रेस या भाजपा ?

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इतिहास में कोई भी घटना यकायक नहीं होती, त्रासदी अपने पीछे एक कालखंड रखती है। फिल्म डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री की मूवी 'द कश्मीर फाइल्स' आने के बाद से छलकुट वर्ग में उपद्रव का माहौल है। होली पर जल बचाने की नसीहत देकर साम्प्रदायिकता फैला रहे वाकपटुते इस फिल्म से साम्प्रदायिक सद्भाव का रोना रो रहे हैं। वहीं कांग्रेस ने भी अपने साम्प्रदायिक अंदाज में इस नरसंहार में मरने वाले लोगों का ठीकरा भाजपा सरकार पर फोड़ा है। कुछ लोग कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए भाजपा सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। अब जब इस पर बहस चल रही है तो यह जान लेना भी आवश्यक है कि इस त्रासदी को खड़ा करने के पीछे आखिर किसका हाथ था?  बात इन्दिरा गांधी के कार्यकाल की है जब 1971 के युद्ध में पाकिस्तान न केवल भारत से हार गया, बल्कि दो हिस्से में बंट गया। यह वो दौर था जब अब्दुल्ला और कश्मीर भारत के करीब आ गए थे। सन् 1972 में, अब्दुल्ला ने "भारत सरकार के साथ हमारा विवाद" की घोषणा की,यह विवाद भारत के साथ विलय के बारे में नहीं बल्कि स्वायत्तता के बारे में था। उसके बाद सन्1975 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और

बुद्धि पक्ष की अवहेलना से केवल विनाश हुआ!

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फिल्म दीदार-ए-यार (1982) का एक गाना है, " सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता, निकलता आ रहा है आफ़्ताब आहिस्ता आहिस्ता'' शायर अमीर मीनाई ने इसे लिखा है मामला नक़ाब से जुड़ा है इसलिए याद आया..!! देश आज कट्टरवाद के बीच में झूल रहा है। दक्षिण पंथियों द्वारा लता जी के निधन पर शाहरुख खान को लेकर जिस प्रकार की टिप्पणियां देखने को मिलीं उनसे यही अपेक्षा की जा सकती है लेकिन वामपंथी इनसे भी ऊंचे निकले इनकी मानें तो लता जी के निधन पर श्रद्धांजलि देना व्यर्थ का काम है क्योंकि वो 92 वर्ष की उम्र में आयु पूरी करके गयी हैं। आज देश दो खेमों में बट गया हैं, वामपंथ और दक्षिणपंथ। मुद्दा कोई भी हो, दोनों तरफ के कट्टरपंथी तैयार मिलते हैं। सेकुलरिज्म का प्रवचन सुनाने वाली कांग्रेस आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। हिजाब मामले में राहुल का बयान केवल विपक्ष के तौर पर ही है, एक लीडर के तौर पर नहीं। उधर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा का भी इस मामले में ढ़ीला-ढाला रवैया देखने को मिला है। उनका कहना है, "चाहे बिकनी हो, घूंघट हो, जींस हो या फिर हिजाब, यह तय करना एक महिला का अधिकार ह

आजादी के 74 वर्ष, कहां तक पहुँचे हम ?

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आजाद भारत को आज 74 वर्ष पूरे हो चुके हैं। कोरोना काल के चलते देश पूरे उत्साह के साथ इस दिवस को मना रहा है। तरह-तरह की कवायद हो रही है। भारतीय इतिहास का यह एक ऐसा दिन है जिसे देखने के लिए गाँधी का सत्याग्रह, शहीद भगत सिंह की कुर्बानी, और लाखो राष्ट्रवादियों का बलिदान ताक पर रखा गया। जहां अल्लामा इकबाल की शायरियां गूंजी , जहां चाचा नेहरू की वकालत, जहां हिंदू मुस्लिम एकता को मिसाल देने वाली पंडित बिस्मिल और अशफाक उल्ला की दोस्ती की कहानी गढ़ी गई, इन सबने भारतवर्ष को एक नई शक्ति प्रदान की । जिसके कारण आज हम इस दिन के साक्षी बन पाए। हम नहीं जानते कितने वर्गों ने, बंधुओं ने भारत की आजादी में सहयोग दिया ? मगर वह सब भारत की आजादी मे ताबूत साबित हुए। हमने अन्धकार का वो समय भी देखा जब हम गुलामी की चरमपंथी विचारधारा से गुजर रहे थे और हमने विश्व कल्याण के मन्त्र को ध्यान मे रखते हुए, अन्य देशो को आजादी के लिए अपनी सेना उपलब्ध कराई लेकिन प्रशंसा की जगह हमे उपहास का पात्र बनना पड़ा । सन् 1930 का वो अकाल दशक जब खाने के लिए हमारे पास सूखी गेंहू तक भी नही थी तब भी हम आजादी का झंडा बुलंद कर रहे थे।

रंगभेद या मनभेद भी !

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अमेरिका में पुलिस हिरासत में एक अफ्रीकी-अमेरिकी व्यक्ति की मौत के बाद अमेरिका में बड़े पैमाने पर हुए विरोध प्रदर्शनों के बीच, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर ने कुछ ऐसा करने का फैसला किया, जिसे कई सालों तक टाला गया था। ट्विटर ने बताया कि, डोनाल्ड ट्रम्प के ट्वीट गलत जानकारी और इसकी नीतियों के खिलाफ हैं। इसने मिस्टर ट्रम्प को एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से सख्त नियंत्रण के सोशल मीडिया प्लेटफार्मों को चेतावनी देने के लिए प्रेरित किया।   मामला यह था जार्ज फ्लायड की अमेरिकी पुलिस द्वारा बर्बर हत्या के बाद पूरे अमेरिका महाद्वीप के 100 शहरो से भी अधिक मे हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए, नतीजतन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हिंसा कर रहे विद्रोहियो को सख्त लहजे मे कहा - " कि आप अमेरिका मे चर्च नही जला सकते " डोनाल्ड ट्रम्प के ट्वीट ने जमकर हंगामा किया। ट्रंप कई बार अपने इस रवैये के चलते दुनिया मे अलोचना का शिकार बन चुके हैं। हो सकता है इसकी भरपाई आने वाले अमेरिकी चुनाव के दौरान चुकानी पड़े। चाणक्य ने भी कहा है - एक राजा को क्रोध, लोभ, मोह, ईष्र्या द्वेष, भाव आदि से मुक्त होकर निर्णय ले

शराबबंदी का सच।

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शराबबंदी का सच - लॉकडाउन के तीसरे चरण में जहां राज्य सरकारों के दबाव में आकर, केंद्र सरकार ने शराब बिक्री के लिए विक्रेताओं को छूट दे दी,वहीं दूसरी तरफ सुनार, साइबर कैफे, घरेलू आवश्यकता पूर्ति को इससे अलग रखा गया। केन्द्र सरकार ने जब राज्य सरकारो को शराब बिक्री को लेकर कुछ देर और पाबंदी लगी रहने का सुझाव दिया, तो राज्य सरकारें हिमालय पर्वत की तरह एकजुट होकर केंद्र सरकार पर दबाव बनाने लगी दलील यह दी गई - यदि केंद्र सरकार शराब से प्रतिबंध नहीं हटाती है तो राज्य सरकारों का खजाना जल्दी ही खाली हो जाएगा ,जिसके लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार मान जाएगा। अब केंद्र सरकार भी इतना घाटा नहीं छेल सकती और वह भी मनगढ़ंत आरोपों से बचना चाहती है इसलिए उसने शराब बिक्री को लेकर लॉकडाउन  में छूट दे दी है ।इस छूट का निष्कर्ष यह निकला कि तमाम देश भर में लाॅकडाउन का उल्लंघन हुआ कोरोना केसेस में बढ़ोतरी होती गई। और जाहिर है की अभद्रता का नाता तो शराब से इस प्रकार जुड़ा है जैसा चरत-भरत के खून जैसा।  खैर शराब बिक्री से राज्य सरकारों को टैक्स प्राप्त होगा, अब जिससे उन्हें राजस्व में बढ़ोतरी मिलेगी।हाल ही में रा

नेहरू -लियाकत अली समझौता।

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14 अगस्त सन 1947 में पाकिस्तान के बन जाने के बाद भारत के लिए तत्कालीन समस्या पूर्वी पाकिस्तान (जो वर्तमान में बांग्लादेश ) से हिन्दुओं एवं बंगाल विभाजन के बाद बने पश्चिम बंगाल से मुस्लिमों का पलायन शुरू हो गया था। पलायन इतनी बड़ी तादाद में था कि आधी आबादी भारत में ही बसना चाहती थी। महात्मा गांधी के द्वारा दिए गए आश्वासन  से जरूर पलायन कर रहे लोगों में अंतर दिखाई दिया। महात्मा गांधी ने कहा था कि जो लोग पाकिस्तान में हैं वह पाकिस्तान में ही रहें ताकि हिंसा और बड़े स्तर तक ना फैल पाए। भारत ने सहिष्णुता की भावना को दिखाते हुए सभी धर्मों को समान भाव से देखा और अपने संविधान में पंथनिरपेक्ष शब्द  जोड़कर विश्व समुदाय को अपना दर्शन कराया।  हांलाकि यह कार्य सन 1976 में 42 वें संविधान संशोधन के द्वारा क्या गया लेकिन इसकी भावना सैकड़ों सालों से थी। जबकि इसके विपरीत भारत से अलग हुए राष्ट्र पाकिस्तान  में अल्पसंख्यकों का दमन लगातार जारी रहा। वहीं पाकिस्तान ने अपने संविधान में इस्लाम धर्म को स्वीकृत किया। जिसके कारण अल्पसंख्यको यानी हिंदुओं को और अधिक दमन का सामना करना पड़ा। लोगों क

चुनावी बॉन्ड पर सवाल क्यों ?

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चुनावी बॉन्ड   चुनावी बांड कुछ इस प्रकार से होता है कि यदि आप 15 दिनों की अवधि वाला बॉन्ड खरीदने के लिए एसबीआई बैंक जाते हैं तो आपको यह छूट दी गई है कि यह आप किसी भी राजनीतिक दल को बॉन्ड दान कर सकते हैं आपकी इसमें पूर्ण गोपनीयता रखी जाएगी ना तो आपको खरीदने के बारे में और ना ही किसी दल के बारे में खुलासा करना है ऐसे में राजनीतिक दल अपनी जिम्मेदारी से भी बच जाते हैं जबकि उन्हें सब पता होता है कि राजनीतिक चंदा किसने दिया है ।  चुनावी बांड के बारे में पहली बार जिक्र फरवरी 2017 में पेश आम बजट में आया था चुनावी बांड को जनवरी 2018 में लांच किया गया था । एक गैर सरकारी संगठन यानी एनजीओ ने उसके अगले ही महीने एक रिट याचिका दायर की थी और इसे चुनौती दी इस बांड के जरिए और यूरोपीय राजनीतिक दलों की तिजोरी में पहुंच गए हैं इस दौरान के राज्यों में विधानसभा स्थानीय निकायों के चुनाव संपन्न हो चुके हैं अब लोकसभा चुनावों की प्रक्रिया शुरू होने के बाद इस पर विचार किया जाना था लेकिन ऐसा नहीं हो सका  मामलों पर सुनवाई को फिर से स्थगित कर दिया गया समस्या -: आम भाषा में समझे तो चुनावी बांड कुछ इ

बोडोलैंड मुददा

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असम में अलग से बोडोलैंड राज्य की मांग 60 के दशक से उठाई जा रही है जिसमें हजारों जाने जा चुकी है। हालांकि केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार और असम की सर्बानंद सोनोवाल सरकार के प्रयासों से अब यह विवाद सुलझने के कगार पर आ चुका है। इसके लिए नई दिल्ली में बैठक हो चुकी है जिसमें बोडोलैंड समर्थकों ने भारत सरकार की बातें मान ली है। बोडोलैंड विवाद  असम में अलग बोडोलैंड की मांग को लेकर 60 के दशक में आंदोलन शुरू हुआ था। बोडो ब्रह्मपुत्र नदी घाटी के उत्तरी हिस्से में बसी असम की सबसे बड़ी जनजाति है। इस जनजाति के लोग खुद को असम का मूल निवासी मानते हैं। एक आंकड़े के मुताबिक असम में बोड़ो जनजाति की आबादी लगभग 28 फीसदी है। इस जनजाति की मुख्य शिकायत है कि असम में इनकी जमीन पर दूसरी संस्कृतियों और अलग पहचान वाले समुदाय ने कब्जा जमा लिया और ये अपने घर में सिकुड़ते चले गए। तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से लगातार घुसपैठियों के आने की वजह से यहां जनसंख्या का संतुलन बिगड़ने लगा, इसी के साथ यहां असंतोष भी बढने लगा । बोडोलैंड का इतिहास   बोडो आंदोलन का इतिहास आजादी के पहले का है। 1920 में बोडो समुदाय के

स्वर भारतवर्ष के

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आज के दिन सभी हम भारतवासी अपना 71 वां गणतंत्र दिवस पूरे हर्षोल्लास,तन्मयता एवं सद्भाव के साथ मना रहे हैं। जाहिर है कि इस दिन हमारा संविधान पूर्ण रूप से लागू हुआ। इस दिन के लिए न जाने हम कब से  प्रयासरत थे हमारे पूर्वजों के द्वारा दिया गया बलिदान हमारे भाइयों बहनों का त्याग एवं और न जाने कितने शहीदों की बदौलत यह अवसर हमें प्राप्त हुआ। जहां अल्लामा इकबाल की शायरियां गूंजती,  जहां चाचा नेहरू का प्यार, जहां हिंदू मुस्लिम एकता को मिसाल देने वाली पंडित बिस्मिल और अशफाक उल्ला की दोस्ती की कहानी वाकई भारतवर्ष को एक नई शक्ति प्रदान करती है। हम नहीं जानते कितने वर्गों ने बंधुओं ने भारत की आजादी में सहयोग दिया है लेकिन इतना जानते हैं कि वह भारत की आजादी मे  ताबूत साबित हुए, जिनके त्याग तपस्या से हम अपनी वैचारिक मूल्यों को एक ग्रंथ में लपेटकर वर्तमान समय तक सुरक्षित रख पाएं उसको हम " संविधान " कहते हैं। इस दिवस को हम 26 नवंबर सन 1949 से संविधान दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं। आज हमें अपने आप पर गर्व होना चाहिए कि हमने संविधान के उन मूल्यों को आदर्शों को बनाए रखा और भविष्य म

भारत में चुनाव सुधार

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राजनीति का अपराधीकरण " देश को कोई बर्बाद नहीं कर सकता अगर लोग इसकी सुरक्षा में खड़े हो और कोई बचा नहीं सकता अगर यह काम दूसरों के भरोसे छोड़ दें" - ---अमेरिकी राजपुरुष डेनियल वेबसटर इस विद्वान पुरुष का यह कथन भारत के संदर्भ में बिल्कुल सही बैठता है। अगर राजनीति को अगर कोई बचाने वाला है तो वह जनता ही है क्योंकि राजनीतिक लोग वोट बैंक की राजनीति के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं लेकिन जब तक भारत के लोग इसके साथ खड़े हैं तब तक भारत पर और भारत की राजनीति पर आंच भी नहीं आने देंगे। ब्रिटिश भारत में चुनाव सुधार- ब्रिटिश भारत में भारतीयों की दमन से उपस्थित होकर भारतीयों ने जो चुनाव सुधार की मांग उस दौरान ब्रिटिश शासन में उठाई थी तब कुछ सुधार आवश्यक देखने को मिली लेकिन उनमें भारतीयों की पूर्ण भागीदारी कभी सुनिश्चित नहीं की गई इन्हीं में से सन 1909 में मार्ले मिंटो ने चुनाव सुधार के नाम पर सांप्रदायिक वर्ग को मुखौटा पहनाना शुरू किया जिसकी नीव सन 1919 में गहराती गई और सन 1928 का साइमन कमीशन इस बात का गवाह है कि भारतीयों की भागीदारी न होने से साइमन कमीशन का

न्यायपालिका की शिथिलता ।

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न्याय किसी नागरिक  के लिए मौलिक अधिकार है कुछ मौलिक अधिकार जो विदेशियों को भी प्राप्त हैं उन में कटौती नहीं की जा सकती। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भारत में सर्वोच्च न्यायालय सबसे बड़ी न्यायपालिका है जो इलाहाबाद में स्थित है वहीं राज्यों के उच्च न्यायालय नागरिकों के लिए गरिमा एवं न्याय की व्यवस्था स्थापित करते हैं।   भारत में न्यायालयों को मंदिरों की संज्ञा दी गई है लेकिन आज हमारे देश में न्यायालयों की शिथिलता लगातार बरकरार है। 2012 में दिल्ली के भयानक निर्भया कांड के दोषी पवन कुमार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई करना इसका त्वरित प्रमाण है पवन कुमार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में जब याचिका दायर की उन्होंने तर्क दिया कि जब इस कांड को अंजाम दिया गया तब पवन कुमार नाबालिग थे जबकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही उन्हें फांसी की सजा सुना दी अब सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई करने की मंशा पेश की है जाहिर होता है कि यह न्याय  मिलना कितना तर्कसंगत है। यह पहला कोई ऐसा मामला नहीं है जिसमें देरी की जा रही है इससे पिछले कुछ मामले ऐसे हो चुके हैं जबकि उन्हें कुछ कहना गलत होगा ज्यादातर माम

जनसंख्या नियंत्रण कानून बनना राष्ट्रीय हित में कितना आवश्यक है?

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TFR (total fertility rate ) कुल प्रजनन दर 2.1% करना केंद्र सरकार का 2025 तक लक्ष्य------ जनसंख्या नीति पर दिल्ली सरकार ने केंद्र सरकार को 6 महीने पहले एक रिपोर्ट सौंपी थी ,जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय जनसंख्या नीति ,राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति और राष्ट्रीय महिला आयोग तथा आयुष्मान भारत के मुख्य लक्ष्य को शामिल करने का प्रयास किया गया था।  इस दौरान भारत के रीप्रोडक्टिव सिस्टम को सुधारने की बात की गई।   जनसंख्या नीति पर भारत का इतिहास- एक व्यवस्थित और आधुनिक जनसंख्या जनगणना, अपने वर्तमान रूप में देश के विभिन्न हिस्सों में 1865 और 1872 के बीच गैर-समकालिक रूप से आयोजित की गई थी। 1872 में समाप्त हुए इस प्रयास को भारत की पहली जनसंख्या जनगणना के रूप में जाना जाता है, हालांकि, भारत में पहली बार संक्रान्ति की जनगणना 1881 में हुई थी। तब से, हर दस साल में एक बार बिना रुके सेंसर किए जाते हैं।     भारत की जनगणना 2001 की सतत श्रृंखला में चौदहवीं जनगणना थी जैसा कि 1872 और स्वतंत्रता के बाद छठी थी। जनगणना का विशाल कार्य दो चरणों में पूरा हुआ। पहले चरण में, हाउस-लिस्टिंग ऑपरेशंस

फास्ट टैग भविष्य में कितना कारगर?

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 क्या है फास्ट-टैग? जैसे ही आपकी गाड़ी टोल प्लाजा के पास आती है, तो टोल प्लाजा पर लगा सेंसर आपके वाहन के विंडस्क्रीन पर लगे फास्टैग को ट्रैक कर लेता है. इसके बाद आपके  फास्ट-टैग  अकाउंट से उस टोल प्लाजा पर लगने वाला शुल्क कट जाता है. ... वाहन में लगा यह  टैग  आपके प्रीपेड खाते के सक्रिय  होते  ही अपना काम शुरू कर देगा.।    1  दिसंबर 2019 से राष्ट्रीय राजमार्ग से गुजरने वाले सभी चार पहिया वाहनों पर फास्ट -टैग  लगाना अनिवार्य कर दिया  गया है।. इस तकनीक का इस्तेमाल देशभर के नेशनल हाईवे के टोल प्लाजा पर होगा.  । कहां से लें फास्ट- टैग ? फास्ट-टैग  को किसी भी प्वाइंट ऑफ सेल (POS) लोकेशन पर जाकर बैंक से ऑफलाइन खरीदा जा सकता है. हालांकि, लंबी कतारों में लगने और समय बचाने के लिए इसके लिए ऑनलाइन आवेदन करना आसान है. हालांकि, फास्ट टैग  आवेदन करने की प्रक्रिया विभिन्न बैंकों में थोड़ी अलग होती है. फिर भी आवेदन की मुख्य बातें सभी में समान रहती हैं.।   फास्ट- टैग   के फायदे- 1.  फास्ट- टैग के उपयोग से (नेशनल हाईवे -NH)राष्ट्रीय राजमार्ग पर लगने वाली लंबी कतारों से मुक्ति म