कृष्ण मेनन : एक विवादित राजनेता



कृष्ण मेनन भारतीय राजनीति में अब तक सबसे विवादित चेहरों में से एक रहे हैं। मेनन रूढ़िवादी प्रकृति के तो थे ही, 1962 के युद्ध हार जाने के बाद उनकी लोकप्रियता हमेशा के लिए धूमिल हो गई। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कृष्णा मेनन द्वारा दिया गया 8 घंटे का भाषण आज तक का लंबा भाषण माना जाता है। सन् 1957 में मेनन मुंबई से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे।

 दिसंबर 1961 में गोवा का एकीकरण और चीन के साथ युद्ध, ये दो सबसे महत्वपूर्ण अवसर रहे जब रक्षा मंत्री के रूप में कृष्ण मेनन ने विश्व का ध्यान अपनी और खींचा। मेनन का विचार था कि यदि भारत ने 1947 में ही पुर्तगालियों को किसी विदेशी देश में भेज दिया होता, तोक  दुनिया के भीतर किसी भी देश ने कुछ नहीं कहा होता; उनका मानना ​​था कि गोवा औपनिवेशिक मुक्ति पर आश्रित हो गया है। अक्टूबर 1959 में बॉम्बे में एक सार्वजनिक सभा में, उन्होंने घोषणा की: "गोवा हमारा क्षेत्र है। हमें इसे मुक्त कराने की आवश्यकता है यह हमारे अधूरे व्यवसाय का एक हिस्सा है।"
 
  कृष्ण मेनन ने स्थिति में हेरफेर किया और और गोवा को पुर्तगालियों से मुक्त कराने की एक तारीख़ रखी। इतनी स्फूर्ति के साथ सशस्त्र बल हरकत में आ गए थे कि ऑपरेशन के 30 घंटे के भीतर गोवा मुक्त हो गया। यह सैन्य इतिहास में सबसे आसान टेक-ओवरों में से एक महत्वपूर्ण घटना थी। अक्टूबर 1950 तक चीन के साथ भारत के परिवार के सदस्य सौहार्दपूर्ण थे, जबकि आश्चर्यजनक रूप से चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया लेकिन चीन तिब्बत की समस्या पर भारत के रुख को नहीं पहचान सका और उसने कहा कि भारत साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ साठगांठ कर रहा है।
  
  इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद कृष्ण मेनन के इस्तीफे को लेकर संसद के अंदर और बाहर हंगामा मच गया: यहां तक ​​कि सत्ताधारी कांग्रेस के जन्मदिन समारोह में भी प्रतिभागियों ने खुद उनके इस्तीफे की मांग की। संघर्ष के इस दौर में समाचार पत्रों का रवैया मेनन के प्रति बहुत कठोर रहा उन्होंने मेनन पर जानबूझकर देश को नीचा दिखाने का आरोप लगाया। पुरजोर विरोध के वाबजूद नेहरू, मेनन का इस्तीफा लेने को तैयार नहीं थे। इसके बाद जब कांग्रेस मंत्रीमंडल ने खुद अपने इस्तीफे देने की बात कही तब नवंबर 1962 में कृष्ण मेनन ने रक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा। कृपलानी की समर्थक मीनू मसानी और अन्य समाजवादियों ने इस अवसर पर विजय उत्सव भी मनाया। इंदिरा गांधी ने अपनी पुस्तक "माई ट्रुथ" में लिखा कि "कृष्णा मेनन के जाने के बाद ही उनके पिता(नेहरू) की फिटनेस में गिरावट आती गई।"
       
   1962 लोकसभा के चुनाव के दौरान कृपलानी नेहरू के रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन के विरोध में खड़े हुए थे, 1962 के लोकसभा चुनाव में नेहरू ने मेनन के चुनाव प्रचार के लिए दिलीप कुमार से बात की थी। दिलीप कुमार ने उनका जमकर प्रचार किया और उनको विजय भी हासिल हुई। इसके बाद 1963 में कृपलानी ने यूपी के अमरोहा से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। 1967 के लोकसभा चुनावों के समय तक मेनन के विरोध में कांग्रेस गुट का प्रतिरोध अब भी समाप्त नहीं हुआ था। इसमें एसके पाटिल मुख्य थे, कांग्रेस विखंडन से पहले इन्दिरा गांधी की एक न चलती थी। नतीजा यह हुआ कि मेनन को इस बार मुम्बई से टिकट नसीब नहीं हुआ फिर मेनन ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन हार का सामना करना पड़ा। मेनन 1969 पश्चिम बंगाल के मिदनापुर से लोकसभा उपचुनाव जीते, 1971 का लोकसभा चुनाव जीतने में भी वह सफल रहे लेकिन मेनन का यह सफर उनकी आखिरी सांस के साथ 1974 में थम गया।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मेनन की मृत्यु को ज्वालामुखी का विलुप्त होना बताया। जयप्रकाश नारायण, मेनन के राजनीतिक विरोधी ने शोक व्यक्त करते हुए लिखा, "कृष्ण मेनन अपने राजनीतिक पेशे के दौरान एक तर्कपूर्ण दृढ़ निश्चयी बने रहे लेकिन उनके सबसे बुरे दुश्मन अब उन पर कपट या अखंडता के नुकसान का आरोप नहीं लगा सकते।"

 आचार्य कृपलानी, जिनको 1962 में उत्तरी बॉम्बे संसदीय क्षेत्र में कृष्ण मेनन के हाथों हार का सामना करना पड़ा था, ने लिखा -" कृष्ण मेनन के अन्दर उनके विश्वास की बहादुरी थी। उन्होंने इंग्लैंड में भारतीय स्वतंत्रता के उद्देश्य को उत्साह और जुनून के साथ स्वीकार किया, और इंडिया लीग के माध्यम से एक बहुत बड़ी मदद की"।

- प्रत्यक्ष मिश्रा 

(लेखक राजनीतिक, साहित्यिक और समसामयिक मुद्दों पर ब्लॉग लिखते हैं)

सन्दर्भ स्रोत - Eminent Parliamentarians Monograph Series के सहयोग से

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अमरोहा की एक सुबह - 1947

ब्लॉग: वो दो शख्सियतें जिन्हें इन्दिरा ताउम्र नहीं भुला पाईं - Hindustan Posts

KashmiriPandits: कश्मीरी पंडितों की त्रासदी का जिम्मेदार कौन कांग्रेस या भाजपा ?