खड़गे के सामने कांग्रेस को पुनः खड़ा करने की अहम चुनौती



मल्लिकार्जुन खड़गे ने कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष चुनाव में अपनी प्रतिपक्षी सांसद शशि थरूर के खिलाफ बड़ी जीत हासिल की। 24 वर्षों में नेहरू-गांधी परिवार के बाहर पार्टी के पहले अध्यक्ष बनने जा रहे खड़गे के सामने कांग्रेस को वापस खड़ा करने की चुनौती सर्वाधिक महत्वपूर्ण होगी।

जिस पार्टी ने हाल के दिनों में लगातार इस्तीफ़ों का दौर देखा, उसे एक 'संगठनात्मक तंत्र' की जरूरत है जो एकजुट होकर काम कर सके। अगर खड़गे ऐसा करने में सक्षम होते हैं, तो कांग्रेस के पास इस साल गुजरात, हिमाचल और कर्नाटक में अगले साल होने वाले विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करने का मौका मिलेगा। खड़गे गांधी परिवार के बेहद करीबी माने जाते हैं ऐसे में खड़गे के पास अनेक अवसर आएंगे जब उन्हें कांग्रेस हाईकमान के पास जाना पड़ेगा, हालांकि राहुल गांधी खड़गे को बधाई देते हुए उनकी कार्यप्रणाली के बारे में पहले ही संकेत दे चुके हैं कि मुझे स्वयं क्या करना है इसका निर्णय कांग्रेस के नवनिर्वाचित अध्यक्ष ही करेंगे। कांग्रेस में खड़गे की भूमिका को देखा जाय तो उन्हें कुछ लोग 'रबर स्टैम्प' बुलाते हैं। अब यह उन पर ही निर्भर करेगा कि वह इस आरोप को ग़लत साबित करने में कितना कामयाब हो पाते हैं, होते भी हैं अथवा नहीं। क्योंकि जहां तक शशि थरूर की बात है तो वह कभी-कभार कांग्रेस की तीखी आलोचना करने से कभी चूके नहीं हालांकि उन्हें अध्यक्ष पद की सीट नसीब नहीं हो पायी।

कांग्रेस का आधार स्तंभ रहेगा कायम


 शशि थरूर ने अपने प्रतिद्वंद्वी खड़गे को उनकी जीत पर बधाई देते हुए औपचारिक रूप से संगठन मजबूत होने की बात कही क्योंकि वह भी पार्टी के अन्दर की हलचल को भली-भांति महसूस करते हैं। शशि थरूर की हार पर लोग जहां हाईकमान के खिलाफ निरर्थक विरोध की बात कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर खड़गे पर गांधी परिवार द्वारा संचालित रिमोट का तमगा लगा रहे हैं। ये आरोप बेबुनियाद भी नहीं हैं। हालांकि थरूर ने साफ कर दिया कि उनकी असहमति उम्मीदवार को लेकर नहीं बल्कि बदलाव को लेकर थी। उन्होंने कहा, मैं असहमति का उम्मीदवार नहीं था मैं बदलाव का उम्मीदवार था। फिलहाल तो खड़गे की जीत से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है वो यह कि नेहरू-गांधी परिवार "कांग्रेस का आधार स्तंभ" बना रहेगा। खड़गे ऐसे गांधीवादी नेता हैं जो बमुश्किल ही कांग्रेस हाईकमान से बिना राय मशविरा किए संरचनात्मक सुधार की बात करें चाहे फिर गुट के अन्दर की बात हो अथवा बाहर की। 

G 23 समूह और राजस्थान संकट को सुलझाने की रहेगी कोशिश


जहां शशि थरूर अब गांधी परिवार गुट के वर्चस्व को स्वीकार करके अपने अल्पकालिक विद्रोह की निरर्थकता को महसूस करेंगे। वहीं खड़गे, G 23 समूह के बाकी सदस्यों को कांग्रेस के करीब लाने की कोशिश करेंगे। G 23 बिखर चुका है जहां इस गुट के सदस्यों में ज्योतिरादित्य सिंधिया, कपिल सिब्बल, जितिन प्रसाद, हार्दिक पटेल और गुलाम नबी आजाद जैसे कई बड़े चेहरे कांग्रेस को पहले ही अलविदा कह चुके हैं। वहीं अन्य सदस्यों के तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में मनीष तिवारी, आनंद शर्मा, पृथ्‍वीराज चव्‍हाण और भूपिंदर सिंह हुड्डा थरूर के बजाय मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम का प्रस्ताव कर ही चुके हैं।थरूर ने समूह में कई लोगों तक पहुंच लेकिन समूह के मुख्य नेताओं का मानना है कि वह एक "गैर-गंभीर उम्मीदवार" हैं और उधर खड़गे एक वरिष्ठ नेता हैं जिनकी बात का सभी समर्थन करते हैं। भले ही महाराष्ट्र के पूर्व सीएम पृथ्वीराज चव्हाण खड़गे का समर्थन कर चुके हैं लेकिन वह अभी भी असंतुष्ट गुट का हिस्सा हैं क्योंकि जब गुलाम नबी आजाद पार्टी छोड़कर गए तब उन्होंने उनके पक्ष में बयान दिया था। वहीं उत्तर प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राज बब्बर, प्रियंका गांधी के यूपी प्रभारी बनने से असंतुष्ट हैं उनको लगता है तबसे उनकी उपेक्षा हुई है। पिछले कुछ समय में राजस्थान में जिस तरह की उठा पटक देखने को मिली इसे देखते हुए यह खड़गे की प्राथमिकता में से एक रहने वाली है। जैसा कि अशोक गहलोत ने सचिन पायलट को अपनी बारी का इंतजार करने की सलाह दी है वहीं खड़गे ने भी अपने इस चुनाव से इसी प्रकार का संकेत दिया। बहरहाल अब दो अहम सवाल उठतें हैं कि क्या अगस्त 2020 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर संगठनात्मक सुधारों की मांग करने वाले G 23 सदस्य इस समूह को बरकरार रख पाएंगे? और दूसरा, राजस्थान संकट को सुलझाने के लिए खड़गे की रणनीति क्या रहने वाली है?

गांधी फेमिली इज वेल फार कांग्रेस


कांग्रेस में G 23 समूह के कुछ सदस्यों को छोड़ दिया जाए तो अन्य किसी वरिष्ठ नेता को पार्टी में संगठनात्मक सुधारों की आवश्यकता महसूस नहीं होती। इसके विपरित गांधी फेमिली को प्रसन्न करने का प्रयास रहता है। आपने देखा होगा 2020 में जब गुलाम नबी आजाद, शशि थरूर और कपिल सिब्बल ने पार्टी में सुधारों की मांग को उठाया तो कैसे पार्टी के सदस्य इन पर दबाव बनाने लगे थे और ज्योतिरादित्य सिंधिया, कपिल सिब्बल, जितिन प्रसाद, हार्दिक पटेल ने पार्टी को अलविदा कहा तो अपने इस्तीफे में राहुल गांधी के प्रति अपना असंतोष व्यक्त किया। पार्टी के मौजूदा वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर और जयराम रमेश गांधी परिवार की कोर को अच्छे से समझते हैं। याद हो कि दिसंबर 2017 में कैसे पार्टी के अध्‍यक्ष पद का नामांकन दाखिल कर रहे राहुल गांधी ने वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर को उनके जहांगीर और औरंगजेब वाले बयान को लेकर उन्हें सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगने के लिए कहा था। यह पहली बार नहीं हुआ बल्कि जिसने भी पार्टी में अपने स्वामित्व/ प्रभुत्व की बात की उसके साथ ऐसा ही हुआ। चाहें वो 1967 के लोकसभा चुनावों में मोरारजी देसाई, नीलम संजीव रेड्डी और 1998 में सोनिया गांधी के लिए बेइज्जत होकर पार्टी अध्यक्ष से इस्तीफा देने सीताराम केसरी हों अथवा G 23 समूह के वे लोग जिनको पार्टी पर गांधी परिवार का एकाधिकार महसूस हुआ इसलिए कांग्रेस के भूतकाल को देखते हुए खड़गे से ज्यादा बदलाव की आशा नहीं की जा सकती है।
  

गांधी परिवार की भूमिका भी रहेगी अहम


जैसा कि भाकपा सांसद बिनॉय विश्वम ने भी बुधवार को इस ओर इशारा करते हुए कहा कि "कांग्रेस का तब तक कोई भविष्य नहीं है जब तक वह अपने नेता और पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को फिर से नहीं खोज लेती।" पार्टी अध्यक्ष पद चुने जाने के बाद खड़गे को गांधी परिवार के सहयोग की भी उम्मीद रहेगी। खड़गे यदि 1963 की तरह के कामराज की भूमिका का निर्वहन कर पातें हैं तो उन्हें सबसे पहले राहुल और सोनिया गांधी की सहमति की आवश्यकता होगी। भाजपा के खिलाफ खड़गे की पसंद उसका मुकाबला करेगी क्योंकि खड़गे ही एकमात्र एक ऐसा चेहरा हैं जो गांधी परिवार, G 23 और राजस्थान संकट को सुलझा सकते हैं। जैसा कि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी को लेकर पार्टी सदस्यों का मानना था कि केसरी का दक्षिण भारत में प्रभाव नहीं है, वह अंग्रेजी नहीं जानते यहां कांग्रेस सदस्य को नए अध्यक्ष खड़गे को लेकर इन समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ेगा।

भाजपा, कांग्रेस के पीछे के पावर हाउस गांधी परिवार को भली-भांति जानती है अगर खड़गे कांग्रेस को एकजुट करने में नाकामयाब साबित होते हैं तो फिर उसके लिए कांग्रेस को तोड़ना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। 

 (प्रत्यक्ष मिश्रा यूपी के अमरोहा में स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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