Ram Manohar Lohia: संसद में समाजवादी लोहिया के द्वारा दिया गया वो ऐतिहासिक भाषण



समाजवादी राम मनोहर लोहिया गतिशील राजनीतिक विचारों के व्यक्ति थे। वह जनता के सच्चे अर्थों में जननायक थे सदैव उसी भाषा में संवाद किया करते। राष्ट्रवाद के हिमायती लोहिया नवयुवकों और नवयुवतियों को पश्चिम की नकल करने के सख्त खिलाफ थे वह भाषा और सभ्यता को लेकर स्पष्ट विचारों के समर्थक थे अंग्रेजी भाषा के प्रति मोह को लोहिया ने 'पापमय मोह' की संज्ञा दी थी। 'तीन आने बनाम पन्द्रह आने' वाद-विवाद में लोहिया के तर्क इतने मजबूत थे कि उन्होंने तत्कालीन सरकार पर लोगों को गुमराह करने का तमगा लगा दिया था। 

सन् 1967 में लोहिया का स्वर्गवास हो गया। लोहिया के जाने से संसद में उनकी कमी हमेशा खलती रही। संसद में उनकी मौजूदगी का हर व्यक्ति सम्मान करता था। लोहिया के द्वारा सन् 1964 में संसद में दिया गया एक भाषण आज भी लोकप्रिय है। लोहिया ने अपने इस भाषण में तत्कालीन सरकार की विदेश नीति और वामपंथ की अधूरी कसौटी की किस तरह से व्याख्या की वह प्रशंसनीय है जिसमें लोहिया कहते हैं, एक जमाना था, जब हिन्दुस्तान की विदेशी नीति दुनिया के दरबारों और बाजारों में जरा अकड़ कर चला करती थी। आज न जाने किस बोझ से, कई तरह के कुकर्मों के बोझ से दबी हुई वह दुनिया के दरबारों में बाजारों से तो वह करीब-करीब हट ही गई है। उनका मानना था कि हिन्दुस्तान ने इन तीन देशों(अमरीका, रूस, चीन) के प्रति अपना रुख ठीक तरह नहीं अपनाया ,इन्हें समझा तक नहीं। 

लोहिया 1962 के युद्ध हारने से निराश थे उसका ज़िक्र करते हुए वह कहते हैं, हिंदुस्तान ने चीन के समझने में शुरू से अब तक भूल की। चीन उस जीव की तरह है, जिसको एक बड़ी पीड़ा है, लेकिन उसे पता नहीं कि वह कौन सी पीड़ा है लेकिन वह छटपटा रहा है। चीन ने सोचा था कि मार्क्सवाद को अपनाने से यह कुछ दूर हो सकेगी। चीन और अमरीका की जो गैर-बराबरी है उससे चीन संतृप्त नहीं है। चीन संतृप्त है रूस से, कि वह अपनी गैर-बराबरी दूर नहीं कर पाया। दोनों मार्क्सवादी देश हैं, फिर भी दोनों गैर-बराबर । इसका कारण यह है कि मार्क्सवाद के पास देश के अन्दर की असमानता का थोड़ा बहुत जवाब अपने ढंग से अलग है लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय असमानता का इसके पास कोई जवाब नहीं है यह चीन की पीड़ा है। 

लोहिया कहते थे कोई भी सामर्थ्यवान ताकत अपने बराबर के मुल्क पर कब्जा नहीं करती वह हमेशा दबे, कुचले राष्ट्र की ओर रुख करती है। चीन ने क्या किया? उसने आस्ट्रेलिया का दरवाजा नहीं खटखटाया, साइबेरिया का नहीं, कैलिफोनिया का नहीं लेकिन दक्षिण कोरिया, दक्षिण वियतनाम और हिमालय का दरवाजा खटखटाया। इसका कारण यह था कि ये कमजोर थे।कम्युनिस्ट हथियारी पशुबल कमजोर के ऊपर चढ़ बैठता है, शक्तिशाली के उपर नहीं। यह केवल हिन्दुस्तान के ऊपर हमले का या हिमालय के ऊपर हमले का सवाल नहीं है। हिन्दुस्तान की विदेश नीति नाकामयाब रही है क्योंकि उसने हमलावर को उस पृष्ठभमि में नहीं डाला । यह गोरों और रंगीनों का मामला है। इसका हल केवल रंगीन नहीं निकालेंगे, उसमें गोरे लोगों को भी शामिल होना होगा, जो कोई उदारवादी गोरे लोग हैं उनको भी शामिल होना होगा और हल निकालना होगा जब ऐसा होगा तब जा कर कहीं आज के युग के राक्षस का हम लोग सामना कर सकते हैं।

युद्ध के बाद चीन की साम्राज्यवादी नीति पर प्रकाश डालते हुए लोहिया कहते हैं, मैंने शुरू से ही हिन्दुस्तान की विदेश नीति चलाने वालों के सामने यह सवाल रखा जो कुछ भी हुआ, बहुत बुरा हुआ उसका आज नतीजा यह है कि चीन मुखिया बन बैठा है, उस गैर-बराबरी के सवाल को लेकर के उस दुनिया का जो बराबरी चाहते हैं। वह मुखिया न रहे इसके लिए हिन्दुस्तान और दूसरी रंगीन दुनिया को कोशिश करनी है। मैं नहीं कहता कि कोई चीन पर हमला कर दे लेकिन इतना जरूर कहना चाहता हूं कि अगर सिद्धान्त को समझ लेते हो तो फिर जिस राक्षसी चीन ने हमारे देश पर हमला किया है, उससे दोस्ती का सम्बन्ध रखना मेरी समझ में कतई समझ ठीक नहीं। 

लोहिया भी जानते थे कि कभी-कभी बाहरी दुनिया को दिखाने के लिए मजबूरी में यह सब करना पड़ता है क्योंकि दुनिया में राक्षस भी हैं और मनुष्य भी हैं। अंग्रेजी वामपंथ दबे-दबे हमलावरों का साथी रहा है। क्यों रहा है? यह लम्बा किस्सा है। अब यहां दो ध्रुव हैं अमरीका और रूस। उनके बारे में मैं चाहूंगा कि हिन्दुस्तान की विदेश नीति साफ-साफ हो जिसमें दो बात रखी जाएं, एक तो दाम का सन्तुलन, दूसरी गरीबी को मिटाना । इन दो को लेकर के इन दोनों के साथ रहने की कोशिश करो, वैसी चीजें नहीं जैसे कि अणु परीक्षण बन्द करो, जैसे तनाव बन्द कर दो, जैसे शिखर सम्मेलन कर लो, जो कि पिछले दस पन्द्रह वर्षों से हिन्दुस्तान ने किया । अब इस से काम नहीं चलेगा। लोहिया आगे कहते हैं, अंग्रेजी वामपंथ की एक और खास आदत रही है और ऐसा खयाल है कि हिन्दूस्तान की सरकार ने या विदेश मंत्रालय ने उसका सबक अंग्रेजी वामपंथ से सीखा है।वामपंथ का मतलब मजदूर पार्टी से नहीं, वामपंथ का मतलब उस जमाने से, स्टेफर्ड क्रिप्स और एलन विलकिंसन के जमाने से, मार्टिन साहब से और कृष्ण मेनन साहब से है। यह अंग्रेजी वामपंथ हिन्दुस्तान को विदेश नीति का सबक सिखाता रहा है। अंग्रेजी वामपंथ ने हिन्दुस्तान को यह हरकत सिखाई है।

– (प्रत्यक्ष मिश्रा अमरोहा स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं। लेखक राजनीतिक, साहित्यिक एवं समसामयिक मुद्दों पर लिखते हैं)


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