JP Birthday : लोकनायक जयप्रकाश नारायण को याद करते हुए..​​

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लोकनायक जयप्रकाश नारायण स्वयं में एक आंदोलन थे वो महात्मा गांधी के अग्रिम पंक्ति के सिपाही थे, उन्होंने कभी सत्ता की तलाश नहीं की। इंदिरा गांधी के राजनीतिक करीबी होने से पहले, जेपी को केंद्रीय कैबिनेट मंत्री, प्रधान मंत्री और भारत के राष्ट्रपति के पदों की पेशकश की गई लेकिन उन्होंने इन सभी अवसरों को ठुकरा दिया।आपातकाल के चरम पर जब इंदिरा गांधी ने देश पर तंज कसते हुए कहा कि 'आजादी से ज्यादा जरूरी खाना है', सर्वोदय नेता जेपी ने नारा दिया; स्वतंत्रता मेरे जीवन की रोशनी में से एक चिंगारी बन गई है। यह स्वतंत्रता मेरे जीवन का जुनून बन गया है और मैं इसे लिए किसी भी मूल्य पर राजी नहीं हूं। 

जेपी के लिए स्वतंत्रता की खोज न्यायसंगत और न्यायपूर्ण व्यवस्था की खोज थी

'द ड्रीम आफ रिवोल्यूशन ए बायोग्राफी आफ जयप्रकाश नारायण' के लेखक बिमल प्रसाद की बेटी और किताब की सहलेखक सुजाता प्रसाद लिखती हैं, जयप्रकाश की स्वतंत्रता की खोज और एक न्यायसंगत और न्यायपूर्ण व्यवस्था सर्वोत्कृष्ट क्रांतिकारी खोज थी। उनके विचार निरंतर अशांति की स्थिति में थे, और खोज ने उन्हें गांधी से मार्क्स तक और फिर गांधी के पास वापस ला दिया। अपनी 1975 की पुस्तक प्रिज़न डायरी में एक प्रविष्टि में, जयप्रकाश ने स्वीकार किया कि जब वे हाई स्कूल में थे तब उन्हें 'क्रांति की बग' ने काट लिया था। उन्होंने विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय में अपने मास्टर के लिए पढ़ते हुए क्रांतियों और क्रांतिकारी आंदोलनों के आंतरिक जीवन का अध्ययन किया। उन्होंने राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर मार्क्स की उत्कृष्ट कृति दास कैपिटल को मानो चाट ही लिया, जिसने उत्पादन के पूंजीवादी मोड के केंद्र में शोषण को उजागर किया। उन्होंने द कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो (मार्क्स से अधिक एंगेल्स), ग्रुंड्रीस और रोजा लक्जमबर्ग, कार्ल लिबनेच्ट और कार्ल कौत्स्की जैसे मार्क्सवादियों द्वारा सैद्धांतिक काम का एक विशाल निकाय भी पढ़ा, और जल्द ही परिसर में एक प्रमुख मार्क्सवादी आवाज बन गए।

जेपी को अपनों ने ही दिया धोखा

सुजाता प्रसाद लिखती हैं, जयप्रकाश के राजनीतिक रुख में कुछ परेशान करने वाली अस्पष्टताएं ही शामिल थीं। उन्होंने मेरे पिता बिमल प्रसाद जो उनके बेहद करीबी माने जाते थे, से कहा कि उनका उद्देश्य राजनीति को कट्टरपंथी बनाने से पहले स्वतंत्रता और लोकतंत्र को बहाल करना है लेकिन 1978 तक क्रांति की गति समाप्त हो गई, इन्हें अपने ही चीयरलीडर्स ने धोखा दिया। एक समय आया जब गांधी के बारे में जोसेफ लेलीवेल्ड के शब्द जयप्रकाश को परेशान करने लगे। 

जब चंद्रशेखर ने इन्दिरा गांधी से कहा जयप्रकाश जी को मलीन न करें आप, वह ऋषितुल्य नेता हैं..

1971 के लोकसभा चुनाव में जब इंदिरा को भारी जीत मिल गई तो चंद्रशेखर ने उनसे कहा कि, आप वायदों को पूरा कीजिए नहीं तो देश में असंतोष खड़ा होगा। जब बिहार आन्दोलन खड़ा हुआ तब 1974 को जेपी ने पटना में एक रैली में घोषणा करते हुए कहा: "यह एक क्रांति है, दोस्तों! हम यहां केवल विधानसभा को भंग होते देखने के लिए नहीं इकठ्ठा हुए हैं। यह हमारी यात्रा का केवल एक मील का पत्थर है लेकिन हमें एक लंबा रास्ता तय करना है। 27 साल की आजादी के बाद, इस देश के लोग भूख, बढ़ती कीमतों, भ्रष्टाचार, हर तरह के अन्याय से त्रस्त हैं यह एक संपूर्ण क्रांति है जो हम चाहते हैं, इससे कुछ भी कम नहीं!" इसके बाद जब जेपी की छवि पर इंदिरा गांधी ने सवाल उठाए तो इसपर चंद्रशेखर ने इंदिरा से कहा कि "जयप्रकाश जी को मलीन न करें आप, वह ऋषितुल्य नेता हैं। उन्होंने देश से कुछ लिया नहीं है, दिया ही है। अगर राजसत्ता संतसत्ता से टकराएगी तो आगे नहीं बढ़ पाएगी।" वर्ष 2018 में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने एक संस्मरण को याद करते हुए लिखा कि चंद्रशेखर की कोशिश थी कि इंदिरा और जेपी में समझौता हो लेकिन इंदिरा गांधी के आस-पास ऐसे लोग थे जिन्होंने ऐसा नहीं होने दिया।

व्यक्तिगत द्वेष की राजनीति से दूर थे जयप्रकाश नारायण

1970 के दशक में कैसे जेपी और इंदिरा गांधी के बीच दूरियां बढ़ती गई इसके बारे में सभी जानते हैं लेकिन यह भी वास्तविकता है कि जयप्रकाश नारायण व्यक्तिगत द्वेष की राजनीति से दूर थे। जेपी ने 20 जनवरी 1966 को अपनी 'डियर इंदु' को इंदिरा गांधी को उनके चुनाव पर बधाई देते हुए लिखा - "आपने बहुत बड़ा बोझ उठाया है।… भाई [नेहरू] के रूप में आपके पास एक अद्वितीय गुरु था लेकिन यह आपके अपने आंतरिक संसाधन होंगे जिन पर आपको भरोसा करना होगा, और मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे आपको विफल नहीं करेंगे … मैं इस देश की जनता के लिए अपना पूरा समर्थन [को] करने की प्रतिज्ञा करता हूं।"

जनता के जेपी

जेपी दिल और दिमाग दोनों तरह से जनता का आदमी थे, जनता के लिए हीं जिये। जेपी ने अपनी जेल डायरी में लिखा - मैं लोकतंत्र के क्षितिज को व्यापक बनाने की कोशिश कर रहा था लेकिन आपातकाल के दौरान, उन्होंने देखा कि कैसे लोकतंत्र के आदर्शों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ सत्तावाद के हाथों समझौता किया जा सकता है और वे अपनी अंतिम सांस तक स्वतंत्रता और लोगों के शासन के चैंपियन बने रहे। 

(प्रत्यक्ष मिश्रा अमरोहा स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं। लेखक राजनीतिक, साहित्यिक एवं समसामयिक मुद्दों पर लिखते हैं)

ईमेल - prataykshmishra@gmail.com

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