रतन टाटा और शिव नाडर हिंदी में क्यों बोलते हैं?- Hindustan Posts



जब कॉरपोरेट इंडिया के महापुरूष रतन टाटा और एचसीएल के फाउंडर चेयरमैन शिव नाडर किसी विषय पर बोलते हैं तो आपको सुनना पड़ता है। वे असल में भारतीय कॉरपोरेट जगत के रखवाले हैं। उन्होंने अपने क्षेत्र में जो हासिल किया है, वह अचंभित कर देने वाला है। यदि हिंदी के जाने-माने विरोधी और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन करुणानिधि अपने राज्य के लोगों पर हिंदी थोपने के खिलाफ बोलते हैं, तो शिव नाडर अपने करियर को बनाने में हिंदी की भूमिका के बारे में क्या कहते हैं, इस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

कुछ साल पहले तिरुचिरापल्ली में सेंट जोसेफ कॉलेज हायर सेकेंडरी स्कूल के छात्रों को संबोधित करते हुए, एचसीएल टेक्नोलॉजीज के संस्थापक ने छात्रों को यह याद दिलाने की कोशिश की कि, भारत एक बड़ा देश था और देश में आबादी का महत्वपूर्ण वर्ग हिंदी समझता था। उन्होंने आगे कहा- "हिंदी सिर्फ भारतीय राज्यों में ही नहीं बोली जाती। इसे विभिन्न देशों के लोग समझते हैं क्योंकि भारतीय हर जगह हैं। जब आप दूसरे देशों में जाते हैं तो इससे आपको मदद मिलेगी।" अरबपति और नेक दिल उद्योगपति शिव नाडर ने भी इस बात को रेखांकित किया कि उनकी स्कूल में सीखी हिंदी के ज्ञान ने तमिलनाडु से परे आईटी क्षेत्र में उनकी प्रतिस्पर्धी उपस्थिति को सक्षम किया। उन्होंने 1960 के दशक में अपने गृह राज्य में हिंदी विरोधी आंदोलन देखा फिर भी हिंदी के लिए उनके विचार ऐसे हैं।

 हाल ही में कुछ दिनों पहले,प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में उद्योगपति रतन टाटा ने असम के डिब्रूगढ़ में एक समारोह को संबोधित करते हुए अंग्रेजी से हिंदी में गियर बदला। मौका था असम के 7 नए कैंसर अस्पतालों के उद्घाटन समारोह का। रतन टाटा ने यह कहते हुए अपना भाषण देना शुरू किया, "मैं हिंदी में भाषण नहीं दे सकता इसलिए मैं अंग्रेजी में बोलूंगा"

कुछ समय अंग्रेजी में बोलने के बाद रतन टाटा ने अपनी उम्र को ध्यान में रखते हुए कांपती आवाज में हिंदी में बोलना शुरू किया "मैसेज वही होगा, मेरे दिल से निकला हुआ।" टाटा ने कहा, "आज असम ने दुनिया को दिखाया कि उसके जैसा छोटा राज्य कैंसर केंद्र का उद्घाटन कर सकता है।" इन दोनों दिग्गजों का बयान स्पष्ट रूप से एक बात साबित करता है कि राजनीति के सिवाय, हिंदी से किसी को कोई भी परेशानी नहीं है, जो कि बहुसंख्यक भारतीयों की मातृभाषा है। हिन्दी का विरोध राजनीतिक है, भौगोलिक नहीं।

सच कहूं तो भारतीय उद्योग जगत की प्रतिष्ठित संस्थाएं और चैंबर ऑफ कॉमर्स, फिक्की, सीआईआई और एसोचैम की भाषा दशकों तक अंग्रेजी थी। सेमिनारों और समारोहों में भाग लेने वाले स्पीकर अंग्रेजी में अपने विचार व्यक्त करते रहे हैं लेकिन अब वह युग समाप्त हो गया । यहां अंग्रेजी के आधिपत्य को चुनौती दी गई क्योंकि युवा कॉर्पोरेट नेताओं के पास केवल अंग्रेजी में बोलने के लिए अपने वरिष्ठों का कोई परिसर नहीं है।

मुकेश अंबानी (रिलायंस), सुनील भारती मित्तल (एयरटेल), आनंद महिंद्रा (महिंद्रा), ओंकार सिंह कंवर (अपोलो टायर्स), नंदन नीलकेणी (इन्फोसिस), संजीव गोयनका (संजीव आरपीजी ग्रुप) जैसे सभी दिग्गज, अंग्रेजी में होने वाली कॉन्क्लेव से लेकर प्रेस मीटिंग तक में हिंदी-अंग्रेजी मिक्स हिंग्लिश भाषा बोलते हैं। लुधियाना में जन्में सुनील भारती मित्तल जब हिंदी में बोलते हैं तो ऐसा लगता है कि उन्होंने कुछ समय हिंदी पत्रकार के रूप में बिताया होगा। वह अक्सर कहते हैं, मेरा मन्ना ही... (मेरा मानना ​​है कि...)। किसी संगोष्ठी या कार्यक्रम के दौरान अधिकतर हिन्दी पत्रकार इस पंक्ति का प्रयोग करते हैं।

खैर, मारवाड़ी और गुजराती उद्योगपति जैसे केके बिड़ला, शशि रुइया, आरपी गोयनका, केएन मोदी, दिलीप संघी, डॉ. एस.के. सोमैया और कई अन्य लोग हिंदी में बात करते थे। शायद उन्हें लगा कि वे किसी अन्य भाषा के बजाय हिंदी में बेहतर ढंग से व्यक्त कर सकते हैं। वहीं फिक्की के पूर्व अध्यक्ष ओंकार सिंह कंवर एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए हिंदी लिपि पढ़ते हैं और अनौपचारिक बातचीत के दौरान वह मीडियाकर्मियों के साथ पंजाबी में भी बात करना पसंद करते हैं।

हैरानी की बात तो यह है कि जहां कोई किसी को हिंदी पढ़ने के लिए मजबूर नहीं करता, वहीं तमिलनाडु और कर्नाटक के कुछ नेता हिंदी थोपने के नाम पर माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। और इस दौरान कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया भी आग बुझाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। हाल ही में उन्होंने बॉलीवुड अभिनेता अजय देवगन और कन्नड़ अभिनेता सुदीप के बीच गर्माती ट्विटर बहस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि, "हिंदी भारत की राष्ट्रीय भाषा कभी नहीं रही और ना ही होगी।" वहीं पूर्व सीएम सिद्धारमैया ने देश की भाषाई विविधता का सम्मान करते हुए कहा, "प्रत्येक भाषा का अपना समृद्ध इतिहास है, जिस पर लोगों को गर्व होना चाहिए।मुझे कन्नड़ होने पर गर्व है।" सिद्धारमैया, क्या आप हमें बता सकते हैं कि कौन कन्नड़ का अनादर कर रहा है? जब वह राज्य के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने केंद्र सरकार को लिखकर राज्य में भाजपा पर शिकंजा कसा था, जिसमें कहा गया था कि राज्य के नागरिकों पर हिंदी नहीं थोपी जानी चाहिए। सिद्धारमैया का कहना था कि उन्हें बेंगलुरु मेट्रो में साइनेज बदलने के लिए "मजबूर" किया गया। जाहिर है, उनका मानना है कि हिंदी का भाजपा के साथ कुछ खास संबंध है, जिस राजनीतिक दल का उन्हें हर समय सामना करना पड़ता है। यही वह मुद्दा है जिसे हल करने की जरूरत है।

हाल ही में प्रसिद्ध हिंदी लेखक और दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक डॉ. प्रभात रंजन ने अपने फेसबुक पोस्ट में एक घटना का जिक्र किया। उन्होंने बताया, "मैं एक प्रतिष्ठित अंग्रेज़ीदाँ स्कॉलेज में पढ़ता था। एक बार मेरे एक सीनियर आए, जो बाद में स्टार बने। तब फ़िल्मों में नए नए गए थे। मैंने उनको नमस्कार किया और उनको जहाँ जाना था लेकर गया। बाद में उन्होंने मेरे एक दोस्त से पूछा, 'प्रभात संघी है क्या नमस्कार-नमस्कार कर रहा था?' एक जमाने में अंग्रेज़ी माहौल में हिंदी बोलने वालों को संघी ही समझा जाता था।" यही समस्या की जड़ है। ऐसा लगता है कि कुछ राजनीतिक दल और कथित हस्तियां हिंदी को संघ और भाजपा के साथ जोड़ देते हैं। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण बात रही है।इस धारणा को बदलना होगा। इस बीच, सिद्धारमैया को अपने राज्यों के दो सबसे सम्मानित नामों से सबक सीखना चाहिए- नंदन नीलकेणी और प्रकाश पादुकोण, जोकि महान बैडमिंटन स्टार हैं। वे दोनों सहजता और स्वभाव से हिन्दी बोलते हैं। अंत में, आइए हम अधिक से अधिक भाषाएं सीखें।



विवेक शुक्ला (वरिष्ठ पत्रकार "Gandhi's Delhi" के लेखक हैं)

-मेल - vivekshukladelhi@gmail.com

नोट - यह लेख "Bizz Buzz" में प्रकाशित है, हिन्दी पाठकों की सुविधा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विवेक शुक्ला जी की अनुमति पर यहां प्रकाशित किया जा रहा है।

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