जयंती विशेष: दल और पंथ की राजनीति से दूर एक मानवतावादी साहित्यकार निर्मल वर्मा


निर्मल वर्मा भारतीय होते हुए भी पाश्चात्य संस्कृति के काफी करीब रहे। उन्होंने भारतीय परम्परा और पाश्चात्य परम्परा दोनों को केन्द्र में रखकर समाज के बदलते हुए तेवर को अपने उपन्यासों में उतारा। इसका प्रभाव उनकी रचनाओं में स्पष्ट तौर देखा जा सकता है। पहाड़ी दुनिया की सैर करते हुए निर्मल वर्मा अकेलेपन से जूझते नजर आतें हैं।कभी-कभी लगता है उनकी रचनाओं का केंद्र प्रकृति की  संवेदना तक पहुंचना है।निर्मल ऐसे लेखक रहे हैं जिन्होंने अपने लेखन और जीवन दोनों में अभिजात्य वर्ग को मुखरता से जगह दी है। 

मार्क्सवाद से मोहभंग भंग  

निर्मल वर्मा के शैक्षिक जीवन में मार्क्सवादी विचारधारा का  प्रभाव था। उन्होंने सेंट स्टीफेंस कॉलेज के प्राध्यापक पद से  मार्क्सवादी दल की सदस्यता स्वीकार कर ली। इसके बारे में उनका कहना था मुझे समझ नहीं आता कि यदि हम अपने समय के महज दर्शक नहीं भोक्ता बनें रहना चाहते हैं तो फिर राजनीति से कैसे पल्ला झाड़ सकते हैं? जिन लेखकों के लिए कम्युनिज्म या फासिज्म कोई अर्थ नहीं रखता, उनके लिए साहित्य भी कोई अर्थ रखता है मुझे गहरा सन्देह है। निर्मल वर्मा के बारे में केवल यहीं सच नहीं है एक सच ये भी है कि निर्मल वर्मा वाम दलों के साथ जुड़े जरूर.. लेकिन राजनीतिक लेखक कभी नहीं रहे। उस समय भी जब वो वाम दल से जुड़े। निर्मल वर्मा एक मानववादी लेखक बनकर रहे। पंथ और दलवाद की राजनीति के चलते साम्यवादी दल के प्रति निर्मल वर्मा का मोहभंग तब हुआ जब रूस की स्तालिन सरकार ने हगंरी में मजदूरों को जुल्मों-सितम से कहर बरपाया। मजदूरों के लिए आवाज उठाने वाले मजदूर संगठनों पर पाबंदी लगा दी गई, उन्हें जेल में ठूंस दिया गया। तब निर्मल वर्मा को लगा कि कम्युनिज्म, फासीवाद का ही दूसरा रूप है। परिणामस्वरूप निर्मल वर्मा ने दो साल बाद ही साम्यवादी दल से त्यागपत्र दे दिया।

विदेश प्रवास के दौरान निर्मल वर्मा ने जाना कि शब्दों पर राजनीतिक व्यवस्था कैसे प्रहार करती है! इस प्रहार की चोट इतनी गहरी होती है कि अन्तर्मन विचलित हो जाता है लेकिन आदमी है कि केवल कराह सकता है। सत्ताधारियों के लिए उसमें आवाज नहीं होती, होती भी है तो केवल वही सुन पाता है जिसके अन्दर संवेदना छुपी हो। जीवन के अंतिम क्षणों में तथाकथित तौर पर दक्षिणपंथी विचारधारा की ओर अपने बढ़ रहे झुकाव को लेकर निर्मल वर्मा की आलोचना की गई।हालाँकि उनकी पत्नी गगन गिल का कहना है कि उनके एंटी-कांग्रेस होने को उनका दक्षिणपंथ की तरफ झुकाव मान लिया गया।

भारतीय परंपरा को लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण

भारतीय परंपरा और संस्कृति को लेकर निर्मल वर्मा की दृष्टि बिल्कुल स्पष्ट रही।निर्मल मनुष्य और ईश्वर के अंतरसंबंधों को भारतीय और यूरोपीय पद्धति की दृष्टि से देखते हैं। उनका मानना है कि भारतीय समाज पिछले 3 हजार वर्षों में बहुदेववादी रहा है इसका कारण है यह था कि उनके देवी-देवता पश्चिम की तरह संग्रहालयों में कैद नहीं होते। उनका मानना है पश्चिम में ईश्वर खंडहरों में कैद रहते हैं। इस सन्दर्भ में कृष्णा सोबती का कहना था कि निर्मल पाश्चात्य जगत की जिंदगी को बहुत खूबसूरत तरीके से पेश करते हैं लेकिन उन्होंने अपने घर में थुंथन घूमते हुए सूअरों की ओर कभी नहीं देखा। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं था। विदेश प्रवास से लौटने पर निर्मल ने अपनी डायरी के कोरे कागज पर भारतीयता पर लम्बे-चैड़े अध्याय लिखे। उनकी जितनी रुचि पश्चिम लेखकों में रिल्के, थॉमसन जैसे लेखकों में है उससे अधिक कहीं अज्ञेय, मुक्तिबोध, रेणु और प्रेमचंद  जैसे भारतीय लेखकों में भी रही। शुरुआती तौर पर जरूर निर्मल वर्मा पाश्चात्य संस्कृति की तरफ आकर्षित रहे लेकिन भारतीयपन की उपेक्षा कभी नहीं की। 

औद्योगीकरण की आड़ में  

सिंगरौली यात्रा करने बाद अंधे औद्योगीकरण को लेकर निर्मल व्यथित हुए।सिंगरौली की भूमि इतनी उर्वरा और जंगल इतने समृद्ध थे कि उनके सहारे शताब्दियों से हजारों बनवासी और किसान अपना भरण-पोषण करते हैं।लेकिन औद्योगीकरण के कारण विस्थापित उद्योगों व कचरे से पर्यावरण संकट पैदा कर दिया। मनुष्य प्रकृति व संस्कृति के बीच संतुलन को नष्ट कर दिया गया । हमें ऐसी योजनाएं बनानी होगी जो इस संतुलन को बनाए रखकर विकास एवं प्रगति करें। कोई भी प्रदेश आज के लालची युग में अपने अलगाव से सुरक्षित नहीं रह सकता। आज का युग लालच का युग है। 

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