पुण्यतिथि विशेष: अपनी कविताओं में बौद्धिकता का प्रयोग करने वाले कवि 'अज्ञेय'



'दीपक हूं, मस्तक पर मेरे अग्नि शिखा है नांच रही' अज्ञेय को पढ़ते हुए अनुभव होता कि वे विचारों, मूल्यों और आदर्शों के कवि हैं। आज उनकी पुण्यतिथि है।अज्ञेय नई कविता आन्दोलन के अग्रणी रहे। वो उस दौर में आएं जब छायावाद की कांति क्षीण हो चुकी थी, प्रगतिवाद चीन और रसिया तक सिमटकर रह गया था। आजादी के पश्चात देश की न केवल भौगोलिक सीमा ही बदली, अपितु सामाजिक परिवेश में भी व्यापक बदलाव आया। विदुषित राजनीति का जहर लोगों की रगों में बसता जा रहा था। रघुवीर सहाय, मुक्तिबोध समेत आदि कवियों ने इसको जहां मुखरता से अपनी रचनाओं में उतारा वहीं अज्ञेय ने इसे आंशिक रूप से ही स्वीकार किया।

यन्त्र हमें दलते हैं

और हम अपने को छलते हैं

थोड़ा और खट लो, थोड़ा और पिस लो।

डॉ द्वारिका प्रसाद सक्सेना कहते हैं, अज्ञेय एक नूतन विचारधारा को लेकर चलने वाले कवि ही नहीं अपितु नूतन काव्यधारा को चलाने वाले कतिपय अन्वेषी कवियों को हिंदी पाठकों के सम्मुख लाकर खड़े कर देने वाले कवि नेता भी हैं।" अज्ञेय ने ही प्रयोगवादी नई कविता को हिंदी काव्य क्षेत्र में पर्दापण करने के लिए प्रेरणा दी। न केवल प्रेरणा दी बल्कि विसंगतियों को दूर करने के लिए उन्होंने एक जज की भूमिका भी निभाई इसलिए अज्ञेय न केवल नूतन काव्यधारा के यशस्वी कवि हैं, अपितु इस धारा के कवियों को प्रकाश में लाने वाले उत्तराधिकारी हैं। नयी कविता में ह्रदय की गूंज कम, बुद्धि विलास अधिक है लेकिन अज्ञेय बुद्धिमान हैं उन्होंने न तो रस की पूर्ण रूप से अस्वीकृत किया और न ही उनमें परम्परा तिरस्कार की भावना ही मुखर हो पायी। अज्ञेय की कविता में बौद्धिकता होने के कारण सूक्ति बन गई, उनकी परवर्ती रचनाओं में स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है।

शक्तियों से मैंने बस एक सीख पाई है 

जो मरण-धर्मा हैं वे ही जीवनदाई हैं।

अज्ञेय के लेखन में ईमानदारी है निष्ठा है केवल प्रगतिशील कहलाने के लिए उन्होंने यथार्थ परिस्थितियों का चित्रण नहीं किया। नया कवि न व्यक्तिवादी है और ना ही समष्टिवादी वरन् वो मानवतावादी है। इस मानवतावादी विचारधारा में आदर्शों की अवहेलना है। अज्ञेय मानते हैं कि "प्रयोगशील कविता में नए सत्यों या नई यथार्थताओं का जीवित बोध भी है उन सत्यों के साथ नए रागात्मक संबंध भी और उनकी पाठक या साहित्य तक पहुंचाने की शक्ति भी निहित है।"

भोगवाद में भोग का सुख निहित है लेकिन अज्ञेय का भोगवाद पीड़ादायक है, उनका मानना है पीड़ा, व्यक्ति के व्यक्तित्व को अग्नि में तपे हुए कुन्दन की भांति निखार देती है जिसकी कांति सर्वव्यापी होती है। पीड़ा व्यक्तित्व का संस्कार करती है।

दर्द की अपनी एक दीप्ति है

ग्लानि वह नहीं देता 

तुमने यदि दर्द ही लिखा है

 भद्दा कुछ नहीं लिखा, झूठ कुछ नहीं लिखा..

एक तरफ अज्ञेय व्यक्तिवादी कवि हैं, फिर भी सामाजिक दायित्वों से पलायन नहीं किया। उनकी सामाजिक दायित्वों के प्रति संचेतना गहन है, पीड़ित के लिए संवेदना का संसार है। 

हमने न्याय नहीं पाया है,

हम ज्वाला से न्याय करेंगे

धर्म हमारा नष्ट हो गया

अग्नि-धर्म हम ह्रदय धरेंगे।

पुरुष अपनी प्रकृति की खोज करता है क्योंकि उस प्रकृति में ही उसका रहस्य है और यहीं उसका संसार भी है । अज्ञेय का जीवन दर्शन इस रहस्यवाद से जुड़ गया जो उनकी आत्मा का ही एक रूप है । इस रहस्यवाद में ही उनके अहं का मूल नष्ट हो जाता है । 

भारतीय संस्कृति से जुड़कर भी अज्ञेय का जीवन इस अर्थ में समकालीन है कि वह प्रकृति और पुरुष के बीच, स्त्री और पुरुष के बीच एक जीवन सत्य की खोज करता है । वह अपनेपन से मुक्त होकर भी मुक्त नहीं हो पाता, वह यातना से गुजर कर आराधना करता है । अज्ञेय ने अपने जीवन दर्शन को प्रकृति और पुरुष के जिन संबंधों से बुना है वह वेदान्त के निकट हैं। उनकी कविताओं में महाशून्य की अवधारणा भी जीवन दर्शन के रूप में आती है। जड़ अवस्था में स्थायित्व नहीं होता, उसे चेतना की आवश्यकता होती है ।अज्ञेय ने विश्वप्रिया के माध्यम से जिस छाया की खोज की है वह उनकी आत्मा का अस्तित्व बन जाती है। 

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