KashmiriPandits: कश्मीरी पंडितों की त्रासदी का जिम्मेदार कौन कांग्रेस या भाजपा ?




इतिहास में कोई भी घटना यकायक नहीं होती, त्रासदी अपने पीछे एक कालखंड रखती है। फिल्म डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री की मूवी 'द कश्मीर फाइल्स' आने के बाद से छलकुट वर्ग में उपद्रव का माहौल है। होली पर जल बचाने की नसीहत देकर साम्प्रदायिकता फैला रहे वाकपटुते इस फिल्म से साम्प्रदायिक सद्भाव का रोना रो रहे हैं। वहीं कांग्रेस ने भी अपने साम्प्रदायिक अंदाज में इस नरसंहार में मरने वाले लोगों का ठीकरा भाजपा सरकार पर फोड़ा है। कुछ लोग कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए भाजपा सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। अब जब इस पर बहस चल रही है तो यह जान लेना भी आवश्यक है कि इस त्रासदी को खड़ा करने के पीछे आखिर किसका हाथ था?

 बात इन्दिरा गांधी के कार्यकाल की है जब 1971 के युद्ध में पाकिस्तान न केवल भारत से हार गया, बल्कि दो हिस्से में बंट गया। यह वो दौर था जब अब्दुल्ला और कश्मीर भारत के करीब आ गए थे। सन् 1972 में, अब्दुल्ला ने "भारत सरकार के साथ हमारा विवाद" की घोषणा की,यह विवाद भारत के साथ विलय के बारे में नहीं बल्कि स्वायत्तता के बारे में था। उसके बाद सन्1975 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी और मुख्यमंत्री शेख द्वारा हस्ताक्षरित अब्दुल्ला ने कश्मीर में कानून पर भारत के नियंत्रण को और मजबूत किया लेकिन अब्दुल्ला के लंबे समय के कारण नियंत्रण सफल नहीं रहा और पाकिस्तान विरोधी भावना की विरासत जो जिन्ना के साथ थी उनके व्यवहार से उपजती दिखने लगी।

पाकिस्तान ने शेख के समर्थन के बिना हमेशा कश्मीर को जीतने का प्रयास किया था, लेकिन ये पाकिस्तान के लिए वहम साबित हुआ और अब अब्दुल्ला को रिझाने का समय आ गया ।1977 में कांग्रेस पार्टी ने अब्दुल्ला से अपना समर्थन वापस ले लिया।सरकार, इस तरह उस समय के नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन को समाप्त कर रही थी। जवाबी कार्रवाई में, कश्मीर समझौते पर हस्ताक्षर करने के दो साल बाद अब्दुल्ला ने एक जनमत संग्रह के बारे में बोलना शुरू किया। सन्1980 में कश्मीर का इस्लामीकरण पूरी ताकत से शुरू हुआ। अब्दुल्ला सरकार ने करीब 2500 गांवों के नाम उनके मूल नाम से बदलकर नये कर दिए थे।उदाहरण के लिए, अनंतनाग के प्रमुख शहर को इस्लामाबाद के नाम से जाना गया।शेख ने सांप्रदायिक भाषण देना शुरू किया जैसा कि 1930 के दशक में भी इसके लिए मस्जिदों का इस्तेमाल किया करते थे।मुरादाबाद में मुस्लिमों के मारे जाने की तुलना जालियावालां बाग हत्याकांड से कर दी। इसके अलावा, उन्होंने अपनी आत्मकथा में उल्लेख किया है।

"कश्मीरी लोग - त्रासदी" शीर्षक से एक पैम्फलेट का वितरण किया गया।अचानक पाकिस्तानी लेखक मोहम्मद युसूफ सराफ की हजारों प्रतियां पुस्तक "कश्मीरी फाइट फॉर फ्रीडम" घाटी में छपीं, जैसाकि चे ग्वेरा द्वारा"ऑन गुरिल्ला वॉर" में हुआ था।साल 1982 में अब्दुल्ला की मृत्यु के बाद अलगाववादी नेतृत्व पूरी ताकत से उभरा। फारूक अब्दुल्ला, जो राष्ट्रीय नेता के रूप में अपने पिता के उत्तराधिकारी बने,1984 के विधानसभा चुनाव में हार गये।उन दिनों जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला के दामाद, गुलाम मुहम्मद शाह बनें।

इसके बाद फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस समर्थित सरकार मेंपहला हिंदू-मुस्लिम दंगा साल 1986 में हुआ।नतीजन 12 मार्च 1986 को राज्यपाल जगमोहन ने शाह की सरकार को दंगे न रोक पाने की नाकामी के चलते बर्खास्त कर दिया। साल 1987 के विधानसभा चुनावों में राजीव सरकार के चुनाव में धांधली के प्रयास से फारूक अब्दुल्ला कश्मीर में आए लेकिन संदिग्ध धांधली के कारण अलगाववादियों का उदय हुआ।हिंदू आबादी काफी असंतुष्ट थी।उनका मानना था कि चूंकि वे अल्पसंख्यक हैं, इसलिए उनके साथ एक समान व्यवहार नहीं किया जा रहा है। ऐसे कई कारण थे जिनके कारणहिंदू-मुस्लिम संघर्षों ने जन्म लिया जैसे, सचिवालय परिसर के अंदर मस्जिद का निर्माण।कई हिंदुओं ने इसका विरोध किया परिणामस्वरूप, कई मंदिर नष्ट किए गए। अनंतनाग में लगातार निशाना बनते कश्मीरी हिन्दू न्याय की मांग करते रहेवो चाहते थे कि अन्य राज्यों के लोगों की तरह उन्हें भी समान दर्जा दिया जाए। 1987 के विधानसभा चुनावों ने आग की लपटों में तेल डाला और सभी अलगाववादी, विरोधी समूह भारत अपने गुप्त उद्देश्यों को पूरा करने के लिए चुनाव लड़ने के लिए एक बैनर तले एकजुट हुए।

नेशनल कांफ्रेंस के दमनकारी उपायों और डराने-धमकाने के कृत्यों को एमयूएफ द्वारा चुनाव आयोग के संज्ञान में लाने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इसने एमयूएफ को आश्वस्त किया कि पूरी चुनाव मशीनरी पक्षपातपूर्ण तरीके से काम कर रही थी। जिसने यूनाइटेड मुस्लिम फ्रंट को नाराज कर दिया था।फारूक के नेतृत्व में जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) अब साम्प्रदायिक तरीके से सक्रिय हो गया।जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने श्रीनगर की जेलों से कई कश्मीरी मुस्लिम युवाओं को रिहा करने का आदेश दिया ।धार्मिक संघर्ष और सांप्रदायिक घृणा शुरू हुई। अब्दुल्ला चुनाव में धांधली को लेकर मलाल करते रहे। सन् 1989 में केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर में अपना अधिकार पूरी तरह से खो दिया था। इसका एक कारण पाकिस्तान के अधिकारियों द्वारा भड़काई जा रही सांप्रदायिक घृणा भी थी। पाकिस्तान सरकार द्वारा कश्मीर के लोगों को भड़काने और उनसे 'आजादी' हासिल करने के लिए प्रोत्साहित करने का माहौल बनाया जा रहा था। कश्मीर से अल्पसंख्यक समुदाय को आतंकवादी संगठनो द्वारा निकालने के लिए फंडिंग हुई। ये वो दौर था जब भारत आतंकवाद और पाकिस्तान दोनों से आजादी चाहता था। हर तरफ हिंदू विरोधी आंदोलन शुरू हो गए। घर-घर आतंकवादियों ने पोस्टर लगाए।कश्मीरी पंडित घबराने लगे।बाद में वर्ष 1990 में फारूक अब्दुल्ला का इस्तीफा, राष्ट्रपति शासन लागू होना राजनीतिक हंगामे, हिंदू विरोधी आंदोलन ने पलायन की गति पकड़ी। पाकिस्तान की मदद से कश्मीरी मुसलमानों का उग्रवाद में ब्रेनवॉश किया गया।घाटी की मस्जिदों में जाकर उन्होंने हर कश्मीरी पंडित को मारने की अपनी योजना की घोषणा की।मस्जिदों पर पंडितों को घाटी छोड़ने, इस्लाम धर्म कबूल करने या मरने के नारे (रालिव, त्सालिव या गैलीव) गूंजते थे।कश्मीर शरीयत के साथ पाकिस्तान का हिस्सा-हिस्सा घाटी में गूंज उठा। खुले तौर पर कहा गया कि वे कश्मीर घाटी को पंडित पुरुषों से मुक्त करना चाहते हैं। कश्मीरी पंडितों के दरवाजों पर नोटिस चिपकाए गए।अखबारों में 'जिहाद' का ऐलान हुआ, हिंदुओं से घाटी छोड़ने को कहा गया।

14 सितम्बर 1989 को कश्मीर में भाजपाई नेता और वकील टीका लाल टपलू की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई। उस दौरान जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट(जेकेएलएफ) अपनी राजनैतिक पैठ बनाने की कोशिशों में जुटा हुआ था। टपलू की अंतिम यात्रा के समय में जब केदार नाथ साहनी और लाल कृष्ण आडवाणी जैसे लोग हजारों कश्मीरी पंडितों के साथ श्रीनगर पहुँचे और घटना के विरोध में कश्मीरी हिंदू संगठनों ने बंद का आयोजन किया तो जेकेएलएफ ने टपलू के अन्तिम कार्यक्रम में पत्थरबाज़ी की।

19 मृतकों को गांवों में पास की झेलम नदी में फेंक दिया गया । इसके बाद 4 नवंबर 1989 को न्यायमूर्ति नीलकंठ गंजू की हत्या, महिलाओं का बलात्कार हो रहा था; सुरक्षा के लिए कोई पुलिस नहीं आई। 13 फरवरी 1990 को श्रीनगर के टेलीविजन केंद्र के निदेशक लासा कौल की हत्या की गई।एक कश्मीरी पंडित महिला गिरिजा टिक्कू की घटना दिल दहलाने वाली थी। गिरिजा एक स्कूल में लैब असिस्टेंट का काम किया करती थी घाटी में भय का माहौल था, किसी ने उसे बुलाया ताकि वह अपना वेतन ले सके। उसे आश्वासन दिया गया कि क्षेत्र का माहौल उसके लिए सुरक्षित है लेकिन बीच रास्ते में उसका अपहरण कर लिया गया फ़िर उसका शव सड़क पर मिला था।पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला है कि उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और बाद में एक लोहे की आरी से उसे दो टुकड़ों में काट दिया गया।यह उन विभत्स घटनाओं में से एक थी जिसके साथ शब्द कभी न्याय नहीं कर सकते थे।उस रात जो घटा, रक्तपात में बहुत कुछ खो चुका था। घाटी की आबादी के एक छोटे हिस्से में रहने वाले पंडित डरे हुए थे परिणामस्वरूप उन्हें अपनी पहचान छिपानी पड़ी। 

हिंदू पुरुषों को दायीं कलाई पर घड़ी पहनने का आदेश दिया गया और पाकिस्तान के मानक समय से मेल खाने के लिए अपनी घड़ियों को 30 मिनट पीछे सेट करने का‌ आदेश जारी किया। पलायन की शुरुआत, 19 जनवरी, 1990 की रात को हुई। जलती हुई सड़कों पर उतरी भीड़, किसी भी पंडित को देखते ही मार डाला। नंगे परिवार सामान लेकर चले गए। 19 जनवरी 1990 की सर्द सुबह थी। कश्‍मीर की मस्जिदों से उस रोज अज़ान के साथ-साथ कुछ और नारे भी गूंजे। 'यहां क्‍या चलेगा, निजाम-ए-मुस्तफा', 'कश्‍मीर में अगर रहना है, अल्‍लाहू अकबर कहना है' और 'असि गछि पाकिस्तान, बटव रोअस त बटनेव सान' मतलब हमें पाकिस्‍तान चाहिए और हिंदू औरतें भी मगर अपने मर्दों के बिना।इस दहशतगर्दी के बीच सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 60 हजार परिवार कश्मीर उजड़ गए और 4‌ लाख कश्मीरी पंडितों पलायन करने को मजबूर कर दिए गए।

अब जब यही बात 'द काश्मीर फाइल्स' में सामने आई तो सदा अभिव्यक्ति और सौहार्द्र पर छाती कूटने वालों ने आरोप-प्रत्यारोप शुरू कर दिए। कांग्रेस सरकार ने तत्कालीन सरकार समर्थित भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा जिस समय कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ उस समय केन्द्र में वीपी सिंह की सरकार थी और राज्य में जगमोहन राज्यपाल थे। लेकिन यदि इस पूरी त्रासदी के घटनाक्रम को देखा जाए तो कांग्रेस सरकार के दोषरोपण खुद में समाहित दिखते हैं। 2 दिसम्बर 1989 को राजीव गांधी सरकार गिरने के पहले टीका लाल टपलू और न्यायमूर्ति नीलकंठ गंजू की हत्या के बाद ही कश्मीर घाटी पंडितों के नरसंहार से खोल उठी थी। गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के दबाव के चलते वीपी सिंह ने एक बार फिर 19 जनवरी 1990 को जगमोहन को कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त किया और उधर आपसी वैमनस्यता के कारण जगमोहन की नियुक्ति के एक ही दिन बाद 20 जनवरी को अब्दुल्ला सरकार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। 19 जनवरी को ऐतिहासिक 4 लाख से अधिक कश्मीरी पंडितों के पलायन के बाद अपना अब्दुल्ला ने इस्तीफा सौंपा फिर सवाल उठता है इस नरसंहार की जिम्मेदारी किसकी थी? रामजन्म भूमि आन्दोलन, बोफोर्स मामले और साम्प्रदायिक तनाव के चलते राजीव सरकार की सिट्टी-पिट्टी गुल हो चुकी थी। राजीव सरकार कट्टरपंथियों से खौफ खाती रही लगातार चुनाव धांधली के चलते कट्टरपंथियों को सत्ता से कुछ समय के लिए दूर रखा लेकिन कांग्रेस कट्टरपंथियों के प्रति कोई सख्ती नहीं दिखा पायी जिसका खामियाजा कश्मीरी पंडितों को एक भीषण त्रासदी के रूप में भुगतना पड़ा। इस नरसंहार को हुए 32 साल हो चुके हैं लेकिन कोई भी सरकार कश्मीरी पंडितों की वापसी नहीं करा सकी बल्कि कांग्रेस सरकार तो खूनी त्रासदी को जन्म देने वाले यासीन मलिक का संरक्षण करती रही वहीं अलगाववादी पार्टी जेकेएलएफ बिट्टा कराटे को इस नरसंहार के लिए फूल जड़ित मालाओं के साथ स्वागत करती रही।




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