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गुजरात में कौन बनेगा किंगमेकर ? - Hindustan Posts

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दिसंबर 2022 में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव की तैयारियां पूरी होने जा रही हैं। भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का मुकाबला त्रिकोणीय माना जा रहा है। गुजरात हमेशा से भाजपा का गढ़ रहा है, यह पीएम मोदी का गृह राज्य भी है और बीजेपी पिछले 27 वर्षों से वहां सत्ता में है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि पीएम मोदी 2014 में अपने 'गुजरात मॉडल' को केन्द्र में रखकर ही गुजरात से दिल्ली पहुंचे थे। 2017 में कांग्रेस पिछले चुनावों की तुलना में अधिक मजबूत रही लेकिन इसके बावजूद भी भाजपा गुजरात में स्पष्ट रूप से सरकार बनाने में कामयाब रही थी। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने लंबे समय के बाद गुजरात में अच्छा प्रदर्शन किया उसे जातिगत नेता के रूप में हार्दिक पटेल जैसे युवा नेता का खूब साथ मिला लेकिन अब पटेल भी भाजपा में जा चुके हैं ऐसे में कांग्रेस के पास अपने जनाधार को एकजुट करने के लिए कम विकल्प हैं।पार्टी और उसके नेता पिछले 27 साल से वहां शासन कर रहे हैं, मोदी डर को वोट में बदलने का फॉर्मूला जानते हैं। भाजपा बखूबी जानती है और यह उसकी रणनीति का भी हिस्सा है कि, लोगों को आपको वोट देने क

खड़गे के सामने कांग्रेस को पुनः खड़ा करने की अहम चुनौती

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मल्लिकार्जुन खड़गे ने कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष चुनाव में अपनी प्रतिपक्षी सांसद शशि थरूर के खिलाफ बड़ी जीत हासिल की। 24 वर्षों में नेहरू-गांधी परिवार के बाहर पार्टी के पहले अध्यक्ष बनने जा रहे खड़गे के सामने कांग्रेस को वापस खड़ा करने की चुनौती सर्वाधिक महत्वपूर्ण होगी। जिस पार्टी ने हाल के दिनों में लगातार इस्तीफ़ों का दौर देखा, उसे एक 'संगठनात्मक तंत्र' की जरूरत है जो एकजुट होकर काम कर सके। अगर खड़गे ऐसा करने में सक्षम होते हैं, तो कांग्रेस के पास इस साल गुजरात, हिमाचल और कर्नाटक में अगले साल होने वाले विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करने का मौका मिलेगा। खड़गे गांधी परिवार के बेहद करीबी माने जाते हैं ऐसे में खड़गे के पास अनेक अवसर आएंगे जब उन्हें कांग्रेस हाईकमान के पास जाना पड़ेगा, हालांकि राहुल गांधी खड़गे को बधाई देते हुए उनकी कार्यप्रणाली के बारे में पहले ही संकेत दे चुके हैं कि मुझे स्वयं क्या करना है इसका निर्णय कांग्रेस के नवनिर्वाचित अध्यक्ष ही करेंगे। कांग्रेस में खड़गे की भूमिका को देखा जाय तो उन्हें कुछ लोग 'रबर स्टैम्प' बुलाते हैं। अ

Ram Manohar Lohia: संसद में समाजवादी लोहिया के द्वारा दिया गया वो ऐतिहासिक भाषण

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समाजवादी राम मनोहर लोहिया गतिशील राजनीतिक विचारों के व्यक्ति थे। वह जनता के सच्चे अर्थों में जननायक थे सदैव उसी भाषा में संवाद किया करते। राष्ट्रवाद के हिमायती लोहिया नवयुवकों और नवयुवतियों को पश्चिम की नकल करने के सख्त खिलाफ थे वह भाषा और सभ्यता को लेकर स्पष्ट विचारों के समर्थक थे अंग्रेजी भाषा के प्रति मोह को लोहिया ने 'पापमय मोह' की संज्ञा दी थी। 'तीन आने बनाम पन्द्रह आने' वाद-विवाद में लोहिया के तर्क इतने मजबूत थे कि उन्होंने तत्कालीन सरकार पर लोगों को गुमराह करने का तमगा लगा दिया था।  सन् 1967 में लोहिया का स्वर्गवास हो गया। लोहिया के जाने से संसद में उनकी कमी हमेशा खलती रही। संसद में उनकी मौजूदगी का हर व्यक्ति सम्मान करता था। लोहिया के द्वारा सन् 1964 में संसद में दिया गया एक भाषण आज भी लोकप्रिय है। लोहिया ने अपने इस भाषण में तत्कालीन सरकार की विदेश नीति और वामपंथ की अधूरी कसौटी की किस तरह से व्याख्या की वह प्रशंसनीय है जिसमें लोहिया कहते हैं, एक जमाना था, जब हिन्दुस्तान की विदेशी नीति दुनिया के दरबारों और बाजारों में जरा अकड़ कर चला करती थी। आज न जाने किस बोझ से,

JP Birthday : लोकनायक जयप्रकाश नारायण को याद करते हुए..​​

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लोकनायक जयप्रकाश नारायण स्वयं में एक आंदोलन थे वो  महात्मा गांधी के अग्रिम पंक्ति के सिपाही थे, उन्होंने कभी सत्ता की तलाश नहीं की। इंदिरा गांधी के राजनीतिक करीबी होने से पहले, जेपी को केंद्रीय कैबिनेट मंत्री, प्रधान मंत्री और भारत के राष्ट्रपति के पदों की पेशकश की गई लेकिन उन्होंने इन सभी अवसरों को ठुकरा दिया।आपातकाल के चरम पर जब इंदिरा गांधी ने देश पर तंज कसते हुए कहा कि 'आजादी से ज्यादा जरूरी खाना है', सर्वोदय नेता जेपी ने नारा दिया; स्वतंत्रता मेरे जीवन की रोशनी में से एक चिंगारी बन गई है। यह स्वतंत्रता मेरे जीवन का जुनून बन गया है और मैं इसे लिए किसी भी मूल्य पर राजी नहीं हूं।  जेपी के लिए स्वतंत्रता की खोज न्यायसंगत और न्यायपूर्ण व्यवस्था की खोज थी 'द ड्रीम आफ रिवोल्यूशन ए बायोग्राफी आफ जयप्रकाश नारायण' के लेखक बिमल प्रसाद की बेटी और किताब की सहलेखक सुजाता प्रसाद लिखती हैं,  जयप्रकाश की स्वतंत्रता की खोज और एक न्यायसंगत और न्यायपूर्ण व्यवस्था सर्वोत्कृष्ट क्रांतिकारी खोज थी। उनके विचार निरंतर अशांति की स्थिति में थे, और खोज ने उन्हें गांधी से मार्क्स तक और फिर गां

Mulayam Singh Yadav: अमरोहा से भी रहा नेताजी मुलायम सिंह यादव का खास जुड़ाव

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बीते सोमवार सुबह नेताजी और धरती पुत्र के नाम से जाने जाने वाले जननेता समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव का गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में निधन हो गया। इस गमगीन माहौल में हर कोई नेताजी से जुड़ी याद साझा कर रहा है। इसी कड़ी में अमरोहा से भी उनकी कई यादें जुड़ी हैं। अमरोहा के गजरौला को एक गांव से औद्योगिक नगरी में तब्दील करने का श्रेय मुलायम सिंह यादव को ही जाता है। रमाशंकर कौशिक के निवेदन पर ही सन् 1980 के दशक में गजरौला को औद्योगिक नगरी घोषित किया गया था। सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के घनिष्ठ सहयोगी रहे स्वर्गीय रमाशंकर कौशिक प्रदेश स्तर की राजनीति में काफी समय तक एक प्रभावशाली भूमिका में रहे। इनके प्रयासों से यहां औद्योगिक इकाइयां लगती गईं।  मुलायम सिंह यादव जिला अमरोहा के गांव पपसरा निवासी स्वर्गीय चंद्रपाल सिंह के बेहद करीबी माने जाते हैं। सन् 1989 में मुलायम सिंह यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो वह पूर्व कैबिनेट मंत्री चंद्रपाल सिंह से मिलने उनके गांव पपसरा पहुंचे थे। एक और किस्सा जब 2015 में जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव की कुर्सी पर काबिज होने के लिए कैबिनेट मं

कृष्ण मेनन : एक विवादित राजनेता

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कृष्ण मेनन भारतीय राजनीति में अब तक सबसे विवादित चेहरों में से एक रहे हैं। मेनन रूढ़िवादी प्रकृति के तो थे ही, 1962 के युद्ध हार जाने के बाद उनकी लोकप्रियता हमेशा के लिए धूमिल हो गई। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कृष्णा मेनन द्वारा दिया गया 8 घंटे का भाषण आज तक का लंबा भाषण माना जाता है। सन् 1957 में मेनन मुंबई से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे।  दिसंबर 1961 में गोवा का एकीकरण और चीन के साथ युद्ध, ये दो सबसे महत्वपूर्ण अवसर रहे जब रक्षा मंत्री के रूप में कृष्ण मेनन ने विश्व का ध्यान अपनी और खींचा। मेनन का विचार था कि यदि भारत ने 1947 में ही पुर्तगालियों को किसी विदेशी देश में भेज दिया होता, तोक  दुनिया के भीतर किसी भी देश ने कुछ नहीं कहा होता; उनका मानना ​​था कि गोवा औपनिवेशिक मुक्ति पर आश्रित हो गया है। अक्टूबर 1959 में बॉम्बे में एक सार्वजनिक सभा में, उन्होंने घोषणा की: "गोवा हमारा क्षेत्र है। हमें इसे मुक्त कराने की आवश्यकता है यह हमारे अधूरे व्यवसाय का एक हिस्सा है।"     कृष्ण मेनन ने स्थिति में हेरफेर किया और और गोवा को पुर्तगालियों से मुक्त कराने की एक तारीख़ रखी। इतनी स

अमरोहा की एक सुबह - 1947

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आजाद सुबह की सूर्य रश्मियों के पीछे बंटवारे की आह अमरोहा के आल्हादित वातावरण में छिपी न रह सकी। विभाजन के बाद पंजाब से विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए एक स्पेशल ट्रेन शरणार्थियों को लेकर अमरोहा भी पहुंची। इसकी सूचना पहले ही मिल चुकी थी और शहर के समाजसेवी मेहमानों को अपने दिलों में जगह देने की तैयारी शुरू कर चुके थे। बहुत-दिन पहले से ही लोग चादर तान कर घर-घर जा गेहूं का आटा इकट्ठा कर रहे थे। लोग भी स्वेच्छा से सहयोग कर रहे थे। मैं लगभग 8 वर्ष का रहा होउंगा, किन्तु सभी कुछ तो याद है।  वह सब कितना अलग था एक दम से इतनी सारी नई शक्लें,अलग पहनावा और भाषा भी, जो अमरोहा में इसके पहले कभी नहीं सुनी गई थी। हमारे घर मोतीभवन के हाते में भी कुछ शरणार्थियों को टिकाने की व्यवस्था की गई थी। विभिन्न आवश्यकताओं के लिये बहुत से खपरैल के छप्पर बने हुए थे। उन्हें रिहायशी उपयोग के लिए परिवर्तित किया गया। जमीन पर पुआल फैलाकर टाट का बिछावन बना दिया गया और एक खपरैल में खाना बनाने की व्यवस्था करदी गई। उन दिनों अमरोहा में पानी के लिये हाथ के नल अथवा कुएं पर ही आश्रित होना पड़ता था। हमारे हाते में कुएं के साथ